एक दिन तकलाकोट में

16जून2010 (तेरहवाँ दिन)
एक दिन तकलाकोट में
(ऊँचाई4000मीटर)

सुबह पाँच बजे आँख खुल गयी उठकर दैनिकचर्या से निपटकर गीज़र ऑन करके पानी गर्म होने का इंतज़ार करती हुई कमरे से बाहर निकलकर आसपास का जायज़ा लेने लगी। कई लोग उठ गए थे। इधर-उधर टहल रहे थे। सभी को चाय की हुड़क थी, :-) पर चाय आठ बजे नाश्ते के साथ मिलनी थी।
अंदर कमरे में आयी तो नलिनाबेन भी उठ चुकीं थीं। हमने स्नान-ध्यान किया और बैग में से पिछले कई दिन के कपड़े निकाल कर धो दिए। बाहर बारिश पड़ रही थी सो सारे यात्रियों ने रिसेप्शन की बार पर, सीढ़ियों की ग्रिल पर सब जगह कपड़े सुखा दिए।
इतने ही में नाश्ते की घंटी भी बज गयी। सभी यात्री हॉल में एकत्र हो गए। वही जैम की छोटी-छोटी शीशियों में चाय, तले हुए -साबुदाने के रंगीन पापड़, मूंगफली दाना और रस्क।
चाय के समय ही एलओ ने बता दिया- ’ग्यारह बजे तक सभी यात्री अपने-अपने डॉलर जमा करा दें और पोनी-पोर्टर के लिए भी डालर सहित नाम लिखवा दें। शहर में घूमने जाने से पहले बताकर और ग्रुप में जाएं।’
हम अपना नाम लिखवाकर और डालर जमा कराकर टेलीफॉन पर घर बात करके गीताबेन, स्मिताबेन, बीना मैसूर के साथ बाहर निकल गए।
तकलाकोट पहाड़ी पर स्थित एक छोटा सा शहर है। जून में भी बहुत ठंड थी। हवा बहुत शुष्क, धूलभरी और थपेड़े मारने वाली थी। (ऊंचाई बहुत होने के कारण अल्ट्रावॉयलेट रेज़) धूप जला देने वाली। पूरा चेहरा ढकने पर भी परेशानी हो रही थी। वहाँ के लोगों ने सनस्क्रीन लोशन थोपे हुए थे, मास्क लगाए हुए थे और सिर पूरी तरह ढ़का हुआ था। जो लोग ऐसा नहीं करे हुए थे उनकी स्कीन जली हुई सी, फटी हुयी भद्दी हो रही थी।
बाज़ार में बड़े-बड़े शॉरूम के अलावा छोटी दुकानें भी थीं। कहीं-कहीं स्त्रियाँ कुछ सामान जैसे जैकेट, स्वेटर रेनकोट इत्यादि हाथ में लेकर इशारे से ग्राहक को बुला रहीं थीं।
घूमते-घूमते हम काफ़ी दूर चले गए। आगे जाकर नेपाली मार्केट था, जहाँ जैकेट, स्वेटर, शॉल, स्कार्फ़ इत्यादि की दुकानें थीं। वे सामान खरीदने पर युवान के अलावा रुपए भी ले रहे थे।
यहाँ तिब्बती लोगों की अपेक्षा चीनी और नेपाली बहुत थे। अधिकाँश स्त्रियाँ पेंट-कोट में दिखायी दीं। इक्का-दुक्का तिब्बती लिवास में नज़र आयीं।
बाज़ार में अन्य यात्री भी मिल गए सभी इकट्ठे घूमते रहे। बहुत से यात्रियों ने जैकेट खरीदीं।
फूड कमेटी ने आनेवाले दिनों के लिए काफ़ी सारी सब्जी खरीदीं। हम इनर्जी-ड्रिंक और लेमनवॉटर की बॉटल्स खरीदते हुए वापिस गेस्ट-हाऊस में आगए।
ढ़ाई बजे लंच के लिए पहुँच गए। वही कल जैसा खाना। सब्जी थोड़ी स्वादिष्ट थी सो उसके सहारे से चावल खा लिए गए।
खाने की टेबल से ही एलओ ने शाम को सात बजे मीटिंग की सूचना देदी। हम अपने कमरे में न आकर सामने वीना मैसूर और स्नेहलता जी के पास बातचीत करने बैठ गए। थोड़ी देर बाद आकर कुछ देर आराम किया।
शाम की चाय के बाद हम सब कॉन्फ़्रेंस-रूम में जाकर बैठ गए। एलओ भी वहीं आगए। एक डेढ़ घंटे तक भजन चलते रहे। भगवानशंकर से प्रार्थना की कि आने वाले दिनों में यात्रा सकुशल पूरी रहे। उसके बाद एलओ ने ज़रुरी पोइंट्स डिसकस किए।
अगले दस दिन की यात्रा के बाद यहीं वापिस आना था सो दस दिन का ज़रुरी सामान ही आगे लेजाने की सलाह देते हुए फालतू सामान को एकसाथ एक बोरे में भरकर अपने दल का न० लिखकर गुरु को सौंपने को कहा।
जिन यात्रियों ने पोनी और पोर्टर दोनों नहीं किए थे उनसे पोर्टर लेने की सलाह दी क्योंकि आगे भी कठिन यात्रा थी। हमने श्रीमति और उसके पति को एलओ से कहकर जबरन एक पोनी भी हायर करा दिया क्योंकि वे दोनों बहुत थकान महसूस कर रहे थे पर पोनी नहीं किए थे।
तीर्थयात्रा के तिब्बत-प्रवास में चीन सरकार द्वारा तीर्थ यात्रियों को किसी भी प्रकार की मेडिकल सहायता प्रदान नहीं की जाती। दिल्ली और गुंजी से ही डॉ. ने हमें संभावित परेशानियों को ध्यान में रखकर दवाइयाँ इत्यादि अन्य सामान रखने की सलाह दे दी थी। हम उन पर ही आश्रित थे।
हमारे दल में कोई भी तीर्थयात्री डॉक्टर नहीं था। एलओ ने सहयात्री मधुप को, जिसने फ़ार्मासिस्ट का कोर्स कर रखा था को मेडिकल सहायता देने की जिम्मेवारी सौंप रखी थी। सभी रोजाना उससे इंस्ट्रूमेंट लेकर ब्लड-प्रेशर चैक करते थे। अन्य किसी भी रुप में तबियत खराब होने पर दवाई लेते थे। मृदुभाषी मधुप बड़े मन से सबकी देखभाल करता था।
मीटिंग में ही गुरु ने डिनर का बुलावा दे दिया। एलओ ने अगले दिन साढ़े छः बजे प्रस्थान का समय बताकर मीटिंग समाप्त कर दी। सभी यात्री डिनर करने चल गए। वही खाना! एक तो अस्वादु दूसरे चौथे टाइम वही सामग्री! क्या करते पेट तो भरना था। :-) मैं अपने साथ दिल्ली से लायी पतीसा का बड़ा डिब्बा ले गयी और जुनेजा को सर्व करने के लिए पकड़ा दिया। सभी ने मुँह मीठा किया।:)
डिनर के बाद अपने कमरे में आकर लगेज संभाला और बाँधकर उसी समय बाहर रख कर बालाजी को बता दिया और आकर सो गए।

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