तकलाकोट से कालापानी
(स्वदेश वापिसी )
चौबीसवाँ-दिन 27/6/2010
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तकलाकोट से लिपुलेखपास (अपने देश की सीमा में प्रवेश)
प्रातः दो बजे मेरी आँख खुल गयी। मैंने नलिनाबेन और स्नेहलता जी को भी उठा दिया। हम तीनों जल्दी-जल्दी दैनिकचर्या एवं स्नान करके तैयार हो गए। हम सोच ही रहे थे कि दरवाज़ा खोलकर गैलरी में देखले कि क्या चल रह है तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई, बाहर देखा तो के.के.सिंह और अशोककुमारजी चाय की केतली और गिलास हाथ में लिए खड़े थे। हमने उनसे चाय लेकर आभार प्रकट किया और अपने स्नैक्स के साथ चाय पीने लगे।
बाहर से हलचल की आवाज़ें आ रहीं थीं, हम तीनो भी अपने हैंड-बैग और बेंत लेकर बाहर निकल गए। मेन गेट पर भी कई यात्री खड़े थे। हम भी वहीं जाकर खड़े हो गए। एक टैंपू में हमसब का लगेज चढ़ाया जारहा था। बराबर में ही बस खड़ी थी पर अभी कोई उसमें बैठा नहीं था।
रात्रि-मिश्रित सुबह के तीन बजे थे। आकाश पूर्ण स्वच्छ तारों से भरा था। वायु शीत-प्रकोपी का अवतार धारण करे हुए थी ऐसा लगता था जैसे आकाश से शीत झड़ रहा हो।
पूर्णिमा से अगली सुबह थी। बिलकुल सामने आकाश में दीप्त पूर्ण
चंद्रमा हमारी विदाई का साक्षी था। हमने अपने कैमरे में तकलाकोट के गेस्ट-हाऊस के प्रांगण से आकाश से अलविदा कहते चंद्रमा को अपने कैमरे में उतार लिया।
3:30 पर जब सारा सामान रखा गया और सभी यात्री वहाँ आगए तो एलओ ने गुरु से सभी यात्रियों को बस में बैठाने को कहा।
हम सब तो तैयार ही थे सो भगवान शंकर के स्मरण करके जयकारों के साथ लपककर बैठ गए ड्राइवर से पीछे की सीट पर। नलिना हमारे साथ बैठीं। अन्य यात्री भी बैठ गए। देरी का कारण था हमारे अति युवा तीर्थयात्री जो बड़ी मुश्किल से इतनी सुबह उठ पाए।
चार बजे एलओ ने सभी यात्रियों की स्वयं गिनती की और पास में ही खड़ी टैक्सी में बैठ गए। स्मरण रहे सैक्रेटरी लेवल रैंक का सरकारी कर्मचारी ही एलओ बन सकता है सो चीन सरकार उन्हें सम्मान के साथ टैक्सी में सुरक्षित मिलट्री कस्टडी में अलग भेजती है।
बस में भी दो पुरुष और एक महिला पुलिस कर्मी साथ बैठे थे। बस चल पड़ी और सीधी कस्टम ऑफ़िस के दरवाज़े पर जाकर रुक गयी। कई सुरक्षाकर्मी बस में सर्च करने आए और सभी यात्रियों को नीचे उतारा गया और डिटेक्टर-मशीन के आगे से निकालकर बस में बैठाया गया।
उसके बाद बस सुनसान पहाड़ी क्षेत्र में चली जा रही थी, धीरे-धीरे पौ फटने लगी आकाश में दिन निकलने से पहले का प्रकाश छाने लगा। बर्फ़ की चमक स्पष्ट दिखायी देने लगी थी।
पाँच बजे हमारी बस पहाड़ों से घिरे एक सुनसान स्थान पर जाकर रुक गयी। एलओ की गाड़ी भी वहाँ खड़ी थी।
गुरु और कई यात्री नीचे उतर गए। कई पुलिस कर्मी और मिलट्रीमैन खड़े थे। दो/तीन छोटी गाड़ियाँ भी खड़ीं थीं।
पता चला कि आगे बस का रास्ता नहीं था सो पोनी और पोर्टर्स का इंतज़ार हो रहा था, ठंड की वज़ह से यात्री बस में बैठे थे। असल में तीर्थ-यात्रियों को सीमा तक पोनी पर पहुँचाने की जिम्मेदारी चीन सरकार की है, इसका खर्चा पहले दिए गए सात सौ डालर में ही सम्मिलित होता है।
कुछ देर में गुरु ऊपर आया और किसी-किसी महिला यात्री से नीचे खड़ी छोटी गाड़ी में जाकर बैठने के लिए कहने लगा। उसने मुझसे भी कहा पर मैं मना करने लगी क्योंकि मैं पोनी पर आराम से बैठ जाती हूँ पर जुनेजा ने मुझसे नीचे जाकर गाड़ी में बैठ जाने का आग्रह किया सो मैं नलिनाबेन और ज्योत्सना के साथ जाकर बैठ गयी।
गाड़ी में बैठते ही तिब्बती ड्राइवर ने झटके से गाड़ी को स्टार्ट किया और इतनी तेज गति से चलाने लगा कि लगता था गाड़ी अब लुढ़की और तब लुढ़की। एक दो बार हमने उसे इशारे से मना भी किया पर वह कहाँ सुनने वाला था। आधे घंटे दौड़ने के बाद एक ऊँची चढ़ाई पर उसका इंजन पीछे भागने लगा सो वह हम तीनों को अकेले जहाँ कोई न था पहाड़ों के बीच नीचे उतारकर हाथ के इशारे से ऊपर चढ़ाई पर रास्ता बताकर स्वयं अन्य यात्री लेने चला गया। हम तीनों वहीं खड़े रहे। हमने अकेले इतनी खड़ी और फिसलन भरी चढ़ाई पर जाना ठीक नहीं समझा।
थोड़ी देर में दूसरी और तीसरी गाड़ी भी यात्री उतार गयी तो हम सब लोग आगे पहाड़ी पर चढ़ने लगे पर मेरे पास बैग भी था सो मैं चढ़ नहीं पा रही थी। मैं आगे न गयी और वहीं खड़ी रही। मुझे दूर नीचे पोनी आते दिखायी दिए, मैं समझ गयी कि हमारे दल के यात्री ही पोनी पर बैठकर आ रहे थे। मैं इंतज़ार करने लगी। इतने ही गुरु और डिक्की चीन-सरकार के अफ़सरों के साथ छोटी गाड़ी से नीचे उतरे। उन्होंने मुझसे आगे जाने को कहा पर मैंने डिक्की से साफ़ मना कर दिया पैदल जाने को। डिक्की मेरे साथ खड़ी होगयी। वह पोनी वालों से यात्री छोड़कर वापिस आकर मुझे ले जाने के लिए बोल रही थी।
मैं वहाँ खड़ी ठंडी हवा से ठिठुर रही थी, मेरी सांस फूल रही थी, तभी अन्य यात्रियों के साथ जुनेजा पोनी पर आता दिखायी दिया, वह मुझे देखते ही पोनी से उतर गया और डिक्की से मुझे बैठाने को कहकर स्वयं पैदल चला गया।
मैं पोनी पर बैठकर आगे बढ गयी। बहुत खड़ी चढ़ाई थी। आते समय यहाँ कई फुट बर्फ़ जमी थी। पोनी तक का सांस फूल रहा था। और आगे बढ़े तो अभी भी सारे में बर्फ़ जमी थी। पोनी की आधी-आधी टंगें बर्फ़ में धंसने लगीं तो पोनी वाली ने डिक्की से कहलवाकर मुझे उतार दिया। मैं अपना बैग लेकर पैदल चल नहीं पा रही थी बार-बार फिसल जाती थी सो डिक्की ने पोनीवाली से मेरा बैग पकड़कर मेरे साथ जाने को कहा।
पोनीवाली मेरा बैग लेकर साथ चलने लगी। हम 5534 मीटर की ऊँचाई पर थे। मेरी सांस फूलने के अलावा गला सूख रहा था।
सात बजे तक लगातार बिना रुके पहाड़ों पर चढकर हम बोर्डर पर पहुँच गए। मैंने पोनीवाली को धन्यवाद के साथ पचास युवान इनाम दिए और वापिस भेज दिया।
सीमा पर चीनी अधिकारी और सैनिक वहाँ खड़े थे। उधर हमारी सीमा में हमारे आयटीबीपी के जवान हमें लेने और चौथे दल को छोड़ने पहुँचे हुए थे।
ठीक सात बजकर पाँच मिनट पर एलओ
और हमारे दल के सभी सद्स्यों ने भारतमाता की जय के साथ अपने देश की मिट्टी को अपने मस्तक पर लगाया और स्वदेश की सीमा में प्रवेश कर गए। हमारे सिपाही हमारे स्वागत के लिए खड़े थे। हाथ पकड़कर सभी को बुला रहे थे। वह पल हमारे लिए गर्व के पल थे। हम अपने देश में लिपुलेख दर्रे पर खड़े थे।
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जून 12, 2011 को '2:43 पूर्वाह्न' पर
वन्दे मातरम!