कालापानी से गुंजी

28/6/2010 पच्चीसवाँ दिन
कालापानी से गुंजी
सुबह पौने छः बजे चाय वाले की आवाज से आँख खुली तो उठकर ब्रश लेकर बाहर गयी। मौसम साफ़ था। डोम के समीप ही पत्थरों से बनाए चूल्हे पर लकड़ी जलाकर बड़े भिगोने में पानी गर्म हो रहा था।
कई यात्री नहाने के लिए पानी ले जा रहे थे हमने भी सोचा पहले नहालें चाय तो रसोई से ले ही लेंगे। सो लौटकर आयी और बैग से धुले कपड़े निकाले और स्नान कर लिया। तैयार होकर अपना बैग अपने पोर्टर को संभलवाकर स्वयं रसोई की ओर जाने वाली थी कि एक कर्मचारी सभी को नाश्ते के लिए बुलाने आ गया। (गुंजी के बाद लगेज धारचूला में ही मिलना था सो दो जोड़ी कपड़े रकसक में ही रख लिए थे)
सभी यात्री नाश्ता करके निकलने के लिए तैयार खड़े थे, तभी एलओ ने कालापानी के निगम कर्मचारियों को बुलाया और उनका आभार प्रकट किया। करतल ध्वनि के बीच पूरे दल की ओर से उन सभी सेवादारों को अलग-अलग लिफ़ाफ़े (कुछ धन राशि) भेंट कराए और विदा ली।
सात बजे के आसपास हम सभी मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर में माँ काली की पूजा और दण्डवत करके आगे बढ़ गए। पोर्टर नदी पार पोनी वाले के पास मिलने की कहकर आगे बढ़ गया था।
काली नदी पार करके कुछ दूर पैदल चलने के बाद पोनी वाले खड़े थे। वहाँ पहुँच कर मैं पोनी पर बैठकर आगे बढ़ गयी।
कालीनदी के किनारे-किनारे चलते-चलते साढ़े नौ बजे के आसपास हमें रोका गया और आयटीबीपी वालों की ओर से चाय और चिप्स सर्व किए गए। उन्हीं के सौजन्य से थोड़ी देर पहले भी एकबार चाय पी चुके थे सो अब मन नहीं था पर सभी को रोका जा रहा था सो रुकना पड़ा।
बातचीत में पता चला कि वहाँ आगे रास्ता समतल था सो मैंने पैदल चलने का निर्णय लिया और अपने पोनी वाले को अगले दिन सुबह मिलने की कहकर अकेले भेज दिया। मैं अन्य यात्रियों और अपने पोर्टर के साथ आगे बढ़ चली। रास्ता कठिन नहीं था।
ग्यारह बजे के आसपास हम गुंजी चौकी के पास पहुँच गए जहाँ आयटीबी का टेलीफोन-बूथ था। मैंने वहीं से अपने घर बातचीत करली क्योंकि गुंजी गेस्ट-हाऊस में अपराह्न में ही सैटेलाइट फोन चालू होता है।
गेस्टहाऊस में सभी को पहले के अनुसार ही कमरों में ठहरना था सो हम अपने कमरे में चले गए। हम तो कालापानी से ही नहाकर चले थे सो बाहर नल पर हाथ-मुंह धोकर बुरांस का शर्बत पिया और बिस्तर पर पसर गए; पर जो नहीं नहाए थे वे गर्मपानी के जुगाड़ में लग गए।
वीना मैसूर और मैं दोपहर के भोजन के बुलावा आने तक गहरी नींद में सोए रहे। उठकर खाना खाया और कुछ देर बाहर चहल-कदमी की।
कुछ यात्री कपड़े धो रहे थे तो कुछ अन्य कार्यों में व्यस्त थे। आज यहाँ पर छोटा कैलाश जाने वाले तीर्थयात्री भी आए हुए थे जिनमें गाज़ियाबाद की ’अखिल भारतीय कैलाश-मानसरोवर समिति’ के संरक्षक श्री महेंद्र कौशिक भी थे जिन्होंने दिल्ली से निकलते ही हमारा स्वागत किया था। हमारे दल के सदस्यों ने भी उनसे बातचीत की।
खाना खाकर हम सुबह के उतारे हुए कपड़े और वाशिंग पाऊडर लेकर कपड़े धोने चले गए। कुछ यात्री आराम कर रहे थे तो यात्रियों में यंगस्टर्स पुलिसजवानों के साथ फ़ुटबाल खेलने चले गए थे।
कपड़े धोकर सुखाते-सुखाते देखा तो पता चला कि सैटेलाइट फोन भी चालू हो गया था पर यात्री सोए हुए थे सो एक दो लोग ही फोन कर रहे थे। हम फटाफट फोन करने पहुँच गए और शायद पहली बार थोड़े बिस्तार से लगभग दस मिनट अपने घर बातचीत की। फोनसेवा पर बैठे श्री जोशीजी भी हंसने लगे हमारे मौके का फायदा उठाने पर। :-)
फोन करके हमने अपने कमरे में आकर धीरे से फोन चालू होने की बात बता दी ताकि जो जागा हुआ हो वह जाकर फोन कर आए। तभी स्नेहलता और वीना मैसूर निकल गयी फोन करने और हम पुनः रजाई में बैठ गए।
साढ़े चार बजे कमरे में ही चाय आगयी। छः बजे सूप सर्व हुआ। सूप पीकर सभी का मंदिर जाने का निश्चित था सो हमसब मंदिर चले गए।
कालापानी की तरह यहाँ भी मंदिर में बहुत रौनक थी। जवानों के अतिरिक्त छोटा-कैलाश जाने वाले तीर्थयात्री भी एकत्र थे। भक्ति-भाव से भजन संध्या हुयी और आरती के साथ प्रसाद वितरण हुआ। भक्ति रस में डूबे हम सब वापिस कैंप आगए।
भोजन तैयार था सभी भोजन कक्ष में पहुँच गए। अशोककुमार जी ने हमेशा की तरह शिव-वंदना करायी और सभी ने भोजन किया। भोजन बहुत वैरायटी वाला था। कई पकवान थे पर हमें भूख नहीं थी सो बहुत थोड़ी सी मीठी सैवैंयां खा लीं, ताकि यह न लगे कि खाना नहीं खाया।
एलओ ने सुबह छः बजे प्रस्थान समय बताकर शुभ-रात्रि बोल दिया। सभी यात्री अपने-अपने कमरे में चले गए।

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One Response to “कालापानी से गुंजी”

  1. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन Says:

    बहुत बढिया।

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