जागेश्वर से दिल्ली

2/7/2010 उनतीसवाँ दिन
जागेश्वर से दिल्ली
जागेश्वर>अलमोड़ा>काठगोदाम>दिल्ली
सुबह चार बजे आँख खुलगयी, मैं उठी और दैनिकचर्या से निपटकर स्नान हेतु कपड़े निकालने लगी तबतक नलिनाबेन इत्यादि भी जाग गयीं और तैयार होने लगीं।
पाँच बजे के आसपास हम तैयार होकर लगभग सौ मीटर की दूरी पर बने अति प्राचीन जागेश्वर मंदिर पहुँच गए। वहाँ आरती शुरु होने वाली थी हम भी आरती में सम्मिलित हो गए, प्रभु के चरणों में ध्यान लगाया और प्रसाद ग्रहण किया।
मंदिर में छोटे बड़े कुल एकसौ आठ देवालय बने हुए हैं।। सभी के अलग-अलग पुजारी हैं। मुख्य मंदिर पर दारुकवन ज्योतिर्लिंग लिखा था हमने वहाँ जलाभिषेक किया और चंदन लगाकर भगवान शंकर की आराधना की। समस्त प्रागंण में घूमकर सभी मंदिरों में दर्शन किए।
मंदिर से वापिस गेस्ट-हाऊस आए; आलू के पराठे, अचार और दही का नाश्ता किया और चाय पी।
गेस्ट-हाऊस के रिसेप्शन पर ही कुमविनि की ओर से ऊनी वस्त्रों की बिक्री हो रही थी। हमने जल्दी से वहाँ से तीन स्वेटर और एक शॉल खरीदी और एलओ का इशारा मिलने पर बस में जाकर बैठ गए।
शंकर भगवान की जय के साथ छः बजे बस चल पड़ी। धन्य था वह ड्राइवर जो स्वयं इतना थका था पर बीते कल हुयी यात्रियों की परेशानी को समझते हुए सभी के साथ बहुत ही सकारात्मक बर्ताव कर रहा था।
भीमताल से होते हुए हम सभी यात्रियों ने साढ़े सात बजे अल्मोड़ा के बाज़ार में प्रसिद्ध बाल मिठाई और बुरांस के शर्बत की बॉटल्स खरीदी और आगे बढ गए।
जैसे-जैसे बस नीचे की ओर आ रही थी तापमान बढ़ता जा रहा था, गर्मी महसूस होने लगी थी।
लगभग डेढ़ बजे हम काठगोदाम गेस्ट हाऊस पहुँचे, जहाँ स्थानीय लोगों ने भोले के जयजयकार के बीच फूलमालाओं से स्वागत किया; शर्बत पिलाकर हम सब को अंदर ले जाया गया, जहाँ कुमंविनि के दफ़्तर से सभी को कैलाश-मानसरोवर यात्रा पूर्ण कर वापिस आने के सर्टिफ़िकेट मिले और भोजन कक्ष में जाकर सुस्वादु भोजन किया।
ढ़ाई बजे एअलो ने सभी से बस में बैठने को कहा। यहाँ से हमें वातानुकूलित डीलक्स बस में बैठाया गया। एक तवेरा गाड़ी भी खड़ी थी, एलओ ने शुभ-कामनाओं के साथ हम सब से विदाली और उसमें जाकर बैठ गए।
तीन बजे बस चल पड़ी। आरामदायक स्थिति मिलते ही अधिकांश यात्री सो गए। हम खिड़की से बाहर झांक रहे थे।
थोड़ी देर बाद मैंने, जुनेजा, मधुप और बिंद्राजी( चारों दिल्ली से हैं) ने मिलकर सभी सहयात्रियों को शाम की चाय और नाश्ता कराने का कार्यक्रम रखा।
गजरौला पर बस रोकी गयी और सभी को उनके स्वाद और इच्छा अनुसार चाय/कॉफ़ी, और नाश्ता परोसकर आतिथ्य-सुख प्राप्त किया।
साढ़े सात बजे हम गाज़ियाबाद के पास पहुँच गए थे, घर से बार-बार फोन आरहा था पर बस जाम में फंस गयी थी। साढ़े नौ बजे हमारी बस दिल्ली गुजराती समाज में पहुँच गयी। हम जैसे ही उतरे हमें लेने आए परिवारजनों ने हमें गले से लगा लिया।
हम तो पहुँच गए थे पर हमारा लगेज पहुँचने वाला था सो हम सब गुजराती समाज में अंदर चले गए। वहाँ श्री उदयकौशिकजी ने फूलमालाओं से सभी यात्रियों का स्वागत किया।
थोड़ी देर में लगेज आगया। लगेज लेकर हमसब गाड़ी में बैठकर अपने घर आगए और बाबा कैलाशपति को नमन किया जिन्होंने कृपा करके अपने धाम बुलाया और सकुशल यात्रा संपूर्ण कराकर मेरा सपना सार्थक कराया।
समाप्त
”ऊँ नमः शिवाय”

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2 Responses to “जागेश्वर से दिल्ली”

  1. Smart Indian - अनुराग शर्मा Says:

    बाल मिठाई का स्वाद मुझे अभी भी याद है और बुरांस का शर्बत देखने का अवसर अभी तक आया नहीं, जबकि यहाँ पिट्सबर्ग में भी बुरांश की झाडियों से घिरा हुआ हूँ।

  2. Vidhan Chandra Says:

    आप ने यात्रा का जो वर्णन लिखा है वो बहुत ही अच्छा है. चित्रों को साइज थम्बनेल जैसी होने के कारण मजा नहीं आया. आप यात्रा के खर्च की जानकारी विस्तार से देती और क्या ले जाएँ, क्या नहीं ले ज आयें; क्या करें क्या, नहीं करें इसकी भी जानकारी देती तो हम जैसे नए लोग आप के लेखन से लाभान्वित होते. यात्रा को सस्ता कैसे बनाया जा सकता है इस पर भी कुछ टिप्स दें

    उ०= विधानचंद्रजी यात्रा वर्णन अच्छा लगा आभार!

    मुझे नहीं लगता कि आपने पूरा-वर्णन पढ़कर टिप्पणी की है वरना आपके सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाते :-)
    कृपया पूरा वर्णन और टिप्पणियाँ पढ़े यदि तब भी कुछ जानना हो तो लिखें अवश्य उत्तर लिखूंगी।
    शुभेच्छु

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