एक दिन गुंजी में…

गुंजी में मेडिकल जाँच
12/6/2010 नवाँ दिन
सुबह छः बजे चाय वाले ने दरवाजा खटखटाया तो आँख खुलीं। सभी ने चाय पीना शुरु कर दिया,(मैं बिना दाँत साफ़ किए कुछ नहीं लेती) मैं ब्रश करने बाहर चली गयी। कई लोग दैनिकचर्या में व्यस्त थे। सामने चूल्हे पर पानी गर्म हो रहा था मैंने भी मग में पानी लेकर हाथ-मुँह धो लिए और रसोई में अपने लिए चाय लेने चली गयी।
रसोई में नाश्ता तैयार कर रहे कु.मं.वि.नि. के कर्मचारी ने गर्म चाय का गिलास पकड़ा दिया, मैं चाय लेकर अपने कमरे में लौट आयी। मेरे कमरे के सभी यात्री चाय पीकर अपना लगेज खोलकर धोने वाले कपड़े निकाल रहे थे। मैं तो यह काम कल ही कर चुकी थी सो नहाने चली गयी।
नहानेवालों की बड़ी लाइन लगी हुयी थी। तापमान बहुत कम होने के कारण खुले में पानी बड़ी देर में गर्म हो रहा था, दूसरे कई बाथरुम्स में यात्री कपड़े धो रहे थे।
मैं वहीं चूल्हे के पास बैठकर आग संवारते हुए खाली बाल्टी का इंतजार करने लगी। इतने में मेरा पोर्टर दिखायी दे गया मैंने उसे बुलाया और एक बाल्टी लाने को कहा। वह तुरंत किसी बाथरुम में से दो बाल्टी ले आया और साफ़ करके मुझे दे दी। गर्म पानी लेकर मैं नहाने चली गयी।
आज नहाकर तृप्ति हुई। रोजाना मुंह अंधेरे जमाने वाली ठंड में जल्दी-जल्दी नहाना तो बस नाम मात्र ही था।
धीरे-धीरे सभी लोग तैयार हो गए। भोजन कक्ष में नाश्ता लग गया था। आज नाश्ते में उपमा मिला था। इतने दिन बाद बिना तला नाश्ता देखकर सभी खुश थे और जी भरकर खाया।
लगभग साढ़े आठ बजे एलओ ने सीटी बजायी सब अपनी-अपनी मेडिकल-फ़ाइल के साथ आकर खड़े हो गए। ’ऊँ नमः शिवाय’ के साथ सभी मंदिर में शीश झुकाते हुए भा.ति.सी.पु.ब. के कैंप के प्रांगण में पहुँच गए जहाँ पहले से ही पूरा प्रबंध था।
बिलकुल सामने एक मेज और कुर्सी लगी थी एक साइड में एक नक्शा लटका हुआ था, दूसरी साइड में एलओ के लिए कुर्सी, मुखातिब होकर सभी तीर्थयात्रियों के लिए कुर्सियाँ बिछायीं गयी थीं। सभी यात्री जाकर बैठ गए।
जवानों ने सभी को पानी और चाय-बिस्कुट सर्व कि। इतने में ही डिप्टी.कमांडर.इन ची. मि.चौधरी और दो डॉ. आगए। ऊँ नमःशिवाय के साथ सभी का हाल पूछा। चौधरी साहब ने यात्रा की ब्रीफ़िंग की। उन्होंने सभी को अपनी हैल्थ के प्रति सजग होने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति भी सजग रहने का आवाह्न भी किया। पर्यावरण की देखभाल के अंतर्गत उनकी बटालियन ने वहाँ एक ’मानसरोवर-वन’ की स्थापना की है जहाँ कैलाश-मानसरोवर जाने वाले सभी यात्रियों से एक-एक देवदार का पौधा रोपवाया जाता है।
उनके संबोधन के बाद डॉक्टर्स ने स्वास्थ्य संबंधी टिप्स दिए | गुंजी हाई-एल्टीट्यूड में आता है। यहाँ पर हवा का दबाव शरीर को प्रभावित करता है। इसलिए यहाँ दो रात ठहराकर शरीर को आगे जाने के लिए तैयार करने के साथ मेडिकल जाँच भी होती है। मेडिकल में फेल होने पर यहाँ से भी वापिस भेजा जा सकता है।
इसके बाद सभी यात्रियों को दो ग्रुप्स में बाँट दिया और एक को मेडिकल जाँच हेतु पास में ही अस्पताल में ले गए और दूसरे को मानसरोवर वन में पौधा रोपने के लिए।
हम पहले ग्रुप में थे सो जाँच के लिए चले गए। मेरा नंबर चौदहवां था। अपने नंबर पर मैं अंदर गयी तो डॉ. ने मेरी रिपोर्ट्स देखीं, ब्लड-प्रैशर हार्ट-बीट इत्यादि चैक की। दिल्ली की रिपोर्ट के मुताबिक मेरा कोलेस्ट्रोल थोड़ा बढ़ा हुआ था, पर ब्लडप्रैशर बिलकुल नॉर्मल था सो फ़िट दे दिया। वीनामैसूर आदि कुछ यात्रियों का ब्लड-प्रैशर हाई था सो उन्हें दवाई देकर शाम को दुबारा जाँच के लिए बुलाया गया था।
इसके बाद मैं, नलिनाबेन, श्रीमति और उनके पति इत्यादि यात्री पौधा रोपने गए। फावड़े से पथरीली ज़मीन खोदकर मुरझाया सा देवदार का पौधा लगाया और पानी दिया। जवानों से उसकी रक्षा का वचन लिया🙂 और वापिस अपने कमरे पर आगयी।
उस दिन सब रिसेक्स्ड मूड में थे। कुछ लोग पास में ही ऊँचाई पर गुंजी गाँव देखने चले गए। मैं और श्रीमति कैमरे की बैटरी चार्ज करने पास में ही बने स्टेट-बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा में (जो भारत की सबसे ऊँचाई पर स्थित शाखा है।) में चले गए। हमसे पहले वहाँ सहयात्री श्री के.के.सिंह जी विराजे हुए थे।
हमने शाखा के पीओ श्री गुंजयाल साहब से आज्ञा लेकर चार्जर ओन कर दिए और बैठ गए।
सबसे ऊँचाई पर स्थित यह बैंक-शाखा बहुत छोटी है। यहाँ दो ही कर्मचारी काम करते हैं। एक्चुअल में यह जवानों की सुविधा के लिए है जो छः-छः महीने तक यहाँ ड्यूटी करते हैं घर नहीं जा पाते हैं।
हम टाइम पास करने के लिए खाली बैठे गुंज्याल साहब से जानकारी हांसिल करने लगे। उन्होंने बताया कि वह इसी गांव के हैं। तभी उनके सरनेम गुंज्याल है। यह गाँव अनुसूचित-जनजाति क्षेत्र में आता है। लोग पढ़-लिखकर शहरों में बड़े पदों पर हैं। यहाँ मुश्किल से चालीस परिवार रहते हैं जो साधनों और ज़मीन के अभाव में बड़ी कठिनाई से जीवन यापन करते हैं। लोगों की खाली पड़ी ज़मीनें बंजर हो रहीं हैं, पर वे दूसरों को खेती करने को नहीं देते। गुंजयाल साहब ने स्वयं दसवीं पास करके यह गांव छोड़ दिया था और धारचूला में पत्नी और बच्चों के साथ रहते हैं।
शाखा बंद होने का समय आगया था, हमारे कैमरे की बैटरी थोड़ी चार्ज हो गयी थी सो हम उनक धन्यवाद करके वापिस कमरे पर आगए।
दोपहर का भोजन तैयार था, खाना खाया और आराम करने लगे।
शाम चार बजे उठकर घर फोन किया फिर बाहर खड़े सहयात्रियों से बातें करने लगी। कुछ यात्री भ.ति.सी.पु.ब. के जवानों के साथ फ़ुटबॉल खेल रहे थे। कुछ उनका मैच देख रहे थे। इधर-उधर टहलते हुए और प्रकृति के नजारे देखते हुए दिन छिप गया।
शाम छः बजे सूप पिया और सभी मंदिर में कीर्तन-आरती में सम्मिलित होने चले गए। मंदिर में यात्रियों ने सुंदरकांड का पाठ किया तो जवानों ने मनमुग्ध कर देने वाले भजन सुनाए। अंत मे आरती हुई जिसमें डिप्टी-कमांडर भी शामिल हुए और सभी को अपने हाथ से प्रसाद बांटा।
वापिस आकर भोजन कक्ष में एलओ ने मींटिंग रखी। सबसे पहले उन यात्रियों के बारे में जानकारी ली जिनका शाम को दुबारा मेडिकल हुआ था,। ईश्वर की कृपा से सब फ़िट थे, उसके बाद अगले दिन की यात्रा के विषय में बताया। कल साढ़े छः बजे प्रस्थान करना था।
हमने भोजन किया और कल कालापानी जाने के लिए बिस्तर पर पसर गए।

क्रमशः

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