भारत-तिब्ब्त-सीमा से तकलाकोट

15जून 2010(बारहवाँ दिन)
तिब्बत में प्रवेश
सुबह ८ बजे के आसपास जब सीमा क्रॉस कर रहे थे तो कुछ जवान कहते सुने गए ’अब हम याद आएँगे।’ सच जैसे ही सीमा छोड़ी अपने को अकेला महसूस किया। न सिपाही थे न पोनी-पोर्टर। कोई मददगार नहीं। कोई राह दिखाने वाला नहीं। एक बार गाइड ने हाथ से इशारा करके बता दिया कि सभी उधर की ओर चलें।
अपने देश में चढ़ाई करके आए थे पर यहाँ उतराई थी। तेज बारिश होने लगी थी। दो-दो मीटर तक बर्फ़ जमीं थी पर एक हाथ में बेंत दूसरे में हैंड-बैग पकड़कर इतनी बर्फ़ में चलना बहुत मुश्किल था। जैसे ही पैर रखें घुटने तक बर्फ़ के अंदर या फिसलकर गिर रहे थे। वीना मैसूर और रश्मि शर्मा तो गिरकर उठी ही नहीं। सब उनकी ओर मुखातिब होकर चिल्लाए “बचाओ उन्हें”!
चीन सरकार ने तीन गाइड (एक पुरुष और दो स्त्रियाँ) (जिन्हें हिंदी बोलनी और समझनी आती थी) तीर्थयात्रियों को गाइड करने के लिए दिए थे पर वे अभी लगेज ही उठवा रहे थे, चीख सुनते ही भागे और उन दोनों को इमरजेंसी गाड़ी में बिठाकर भेज दिया। अन्य सभी यात्री भोले की जय बोलते हुए फिसलते-लुड़कते आगे बढ़ गए।
मैं अपना बैग संभाल नहीं पा रही थी। बार-बार फिसलन पर लुढ़का देती और धीरे-धीरे उतर रही थी। सबसे ज़्यादा परेशानी तब होती थी जब एक पैर बर्फ़ में से निकालकर दूसरा आगे बढ़ाओ तो वह भी अंदर। बाद में मेरा बैग अशोककुमार जी ने ले लिया और आगे निकल गए।
जैसे तैसे करके वह बर्फ़ीला मार्ग तय किया और सूखे पथरीले मार्ग पर आगए। दो घंटे तक लगातार पहाड़ी मार्ग पर उतरे, जहाँ ह्यूमिडिटि बहुत थी और वनस्पति नाम का पत्ता भी न था। कुछ लोग जी मिचलाने की शिकायत भी कर रहे थे।
सवा दस बजे उस जगह पहुँचे जहाँ हमें लेने आयी बस खड़ी थी। सभी बेहाल थे। चीन-सरकार की बद-इंतज़ामी को झींक रहे थे कि पोनी या पोर्टर क्यों नहीं दिए जबकि पैसा पूरा ले रहे थे।
जब सब यात्री आगए तो गाइड जिसका नाम गुरु था ने अपनी सहयोगी डिक्की और दूसरी लड़की (नाम भूलगयी) का परिचय दिया और बताया कि हम कस्टम-चैकिंग के लिए जा रहे थे। सभी को आवश्यक-रुप से स्वेटर पहने रहने को कहा। यात्री-गणना के पश्चात बस चल पड़ी।
मिट्टी के पहाड़ी-पठारी-मार्ग पर चढती उतरती धूल उड़ाती बस में बैठकर सुबह से थका शरीर बहुत कष्ट महसूस कर रहा था। बस बॉर्डर के मिलट्री-एरिया से गुज़र रही थी सो गुरु ने फोटो बिलकुल न लेने और कैमरे बंद रखने की हिदायत दी।
ग्यारह बजे के आसपास हम कस्ट्म ऑफ़िस में दाख़िल हो गए। एक बड़े से हॉल मे सभी को खड़ा कर दिया न बैठने की जगह न लिखने के लिए डेस्क। कस्ट्म औपचारिकताओं से संबंधित जानाकारी भरने के लिए सभी को एक-एक परफ़ोर्मा पकड़ा दिया। कुछ लोग तो ज़मीन पर ही बैठ गए। फिर लाइन में लगकर अंदर गए जहाँ सामने दीवार पर इन्फ़्रा-रेड कैमरा लगा था सभी का टेंप्रेचर रिकॉर्ड हो रहा था। एक दो यात्री जिन्हें थोड़ा बुखार था (रश्मी खंदूरी और नागराज इत्यादि) को रोककर उनका अलग से कुछ टेस्ट हुआ। बैल्ट-पाऊच और हैंडबैग्स भी एक्सरे मशीन से गुजारे। शिव की कृपा से सब कुछ ओके था।
पुनः बस में बैठकर तकलाकोट शहर में पुरंग गेस्ट-हाऊस की ओर चल पड़े। मुश्किल से बीस मिनट में गेस्ट-हाऊस प्रीमिसिस में पहुँच गए।
गेस्ट-हाऊस नयी बिल्डिंग में था। पहुँचते ही एलओ ने गुरु की मदद से सभी को कमरे नंबर बता दिए। कमरे बहुत बड़े और वैल-फर्नीश्ड थे। अटैच बाथ-रुम में गीज़र लगे थे।
मैं और नलिनाबेन एक साथ में ठहरीं तो स्नेहलता और बीना मैसूर एकसाथ बिलकुल सामने वाले कमरे में। लगेज के बैग्स उठाकर अपने कमरे मे रखते समय पोर्टर बहुत याद आया।
हमारी घड़ी में बारह चालीस हो रहे थे, (चीनी समय हमारे देश के समय से डेढ़घंटा आगे होता है) गुरु ने एक घंटे के अंदर भोजन के लिए भोजन कक्ष में पहुँचने के लिए कहा।
हम स्नान इत्यादि के बाद भोजन-कक्ष में पहुँच गए। बड़ा सा हॉल जिसमें पाँच बड़ी गोल मेज लगीं थीं और चारों ओर कुर्सियाँ लगीं थी। सामने किचेन का दरवाज़ा था जहाँ एक मेज पर टमाटर सूप, फीके फ़्राइड चावल और बंदगोभी की सब्जी रखी थी। पास में ही खाली बाऊल, प्लेटें और चम्मच थे। अपनी प्लेट और बॉउल लेकर जाने पर दो चीनी स्त्रियाँ (जिन्हें हिंदी बिलकुल नहीं आती थी) खाना परोस रहीं थीं।
चाहे कितने ही भूखे थे पर खाना बिल्कुल स्वाद न लगा। एलओ ने सभी को सूप ज़्यादा पीने की सलाह दी। पहाड़ों पर लिक्यूड डाइट अवश्य लेनी चाहिए। खाना जबरन निगलकर अपने कमरे में आगए और सो गए।
शाम को साढ़े पाँच बजे चाय की घंटी बजी, गुरु और डिक्की स्वयं भी दरवाज़ा खटखटाकर चाय पीने को बुला रहे थे। फिर उसी भोजन-कक्ष में पहुँचे। हरेक मेज पर बड़ी-बड़ी प्लेटों में तले हुए साबूदाने के रंग-बिरंगे पापड़, फ़्रायड मूंगफली के दाने और टोस्ट रखे थे। एक कटोरे में जैम थी। चाय के लिए कप न होकर काँच की छोटी-छोटी जैम की शीशियाँ प्रयोग हो रहीं थीं।
चाय पीते-पीते ही एलओ ने सात बजे फ़र्स्टफ़्लोर पर कॉन्फ़्रेंस-हॉल में मींटिंग करने की सूचना दी और गुरु को भी साथ रहने को कहा।
चाय पीकर बाहर आए तो पता चला कि सामने ही एक घर में टेलीफ़ॉन की सुविधा है। मैं और नलिनाबेन लपके उस ओर, वहाँ प्रकाशवीर, सुरेश और राजेशजोशी भी खड़े थे। हम दोनों ने अपने-अपने घर फोन किया और थोड़ा बाहर निकलकर देखा।
गेस्ट-हाऊस से बाहर निकलते ही बाज़ार था। अधिकांश दुकानों पर स्त्रियाँ सामान बेच रहीं थीं। वार्तालाप की प्रोबलम थी, वे न तो हिंदी जानतीं थीं और न अंग्रेजी और न हम चीनी भाषा।। हम सामान उठाकर दिखाते और वो केल्कुलेटर पर अंक लिख देतीं, इतने यूरो क़ीमत! हम बार्गेनिंग करते और केलकुलेटर पर अपनी पसंद के अंक लिख देते और इस तरह हमने मास्क और छतरी (हवा से होंठ बचाने के लिए) और नलिना ने एक हैंड बैग खरीदा उनका बैग टूट गया था। कुछ इनरजी-ड्रिंक्स और फल खरीदे और वापिस आगए। हवा बहुत रूखी और तेज थी। वहाँ सभी ने मुंह पर मास्क लगाए हुए थे।
निर्धारित समय पर सभी कॉन्फ़्रेंस-हॉल में एकत्र हो गए। पहले आधे घंटे तो शिव-वंदना और कीर्तन हुआ। उसके बाद एलओ ने संबोधित किया।
सात सौ डॉलर तो चीन-सरकार को देने थे, जो श्री वेणुगोपालजी के पास जमा कराने थे। इसके अलावा पोनी-पोर्टर हायर करने के लिए (यदि चाहिए था तो नाम भी लिखवाना था) और शोपिंग करने के लिए अलग से डॉलर के यूरो बदलवाने के लिए श्री त्यागी के पास जमा करने थे। मैंने यहाँ भी पोनी और पोर्टर दोनों हायर किए जिसके लिए १९९० युवान जमा कराने थे सो मैंने सभी खर्च मिलाकर छः सौ डालर के और युवान बदलवा लिए।
आगे यात्रा में खाना पकाने के लिए तीन कुक हायर किए गुरु की मदद से।
उसके बाद सभी डिनर करने आ गए। फिर वही फीके चावल, सूप और सब्जी। बिना मन के थोड़ा-बहुत खाकर अपने कमरे में चले गए। कल यहीं विश्राम करना था सो कल की कोई चिंता नहीं थी इसलिए निश्चिंत होकर सो गए।

टैग:

One Response to “भारत-तिब्ब्त-सीमा से तकलाकोट”

  1. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन Says:

    वैसे तो यात्रियों को थोडा नमक, मिर्च, गरम मसाला आदि भी साथ ले जाना चाहिये। शायद चीनी लोग हमारे खाने जैसा स्वाद नहीं ला पायेंगे। फिर भी ऐसा समझा जाता है कि ऊंचे स्थानों पर हमारी स्वादेन्द्रियों की क्षमता कम हो जाती है, इसलिये भी खाना बेस्वाद लगता है। लुफ्तहंसा के एक स्वाद सम्बन्धी प्रयोग के बारे में निम्न लिंक से पढा जा सकता है:
    http://online.wsj.com/article/SB10001424052748703294904575384954227906006.html?mod=e2tw

    उ०= टिप्पणी हेतु धन्यवाद!
    नमक मिर्च सब कुछ साथ था, पर रसोई बनाने वाली चीनी महिला थोड़े चिड़चिड़े स्वभाव की थी, वह गुरु की बात भी नहीं मानती थी। हम महिला यात्रियों ने तो उससे पकाने में (उतनी ही सामग्री से) मदद की पेशकश भी की थी पर वह नहीं मानी।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s


%d bloggers like this: