अष्टपद-दर्शन

गतांक से आगे
17/6/2010 चौदहवाँ दिन
अष्टपद-दर्शन
दूरी आठ किमी।

धूप तेज तो थी, आकाश भी स्वच्छ था, पर हवा बहुत ठंडी थी। गुरु ने सभी को टोपी और गलब्ज़ भी पहनने की सलाह दी। सभी जल्दी-जल्दी तैयार होकर कैमरे से लैस प्रांगण में एकत्र हो गए।
सवा दो बजे आठ जीप (गाड़ियाँ) आ गयीं। छः-छः यात्री एक-एक गाड़ी में बैठ गए गुरु और डिक्की भी इन्हीं में एडजस्ट हो लिए।
गुरु ने चलने का इशारा किया और ड्राइवर गाड़ी को विमान की गति से दौड़ाने लगे। तेज दौड़ाते हुए वे पहाड़ी रास्ते पर चढ़ गए। पथरीले चट्टानों भरे रास्ते से, जल-धाराओं के बीच से निकालते हुए, एक -दूसरे से होड़ सी करते हुए इतनी तेज चल रहे थे मानों जीप-रेस हो रही हो।
तीन बजे के आसपास जीप एक नदी के किनारे बिलकुल निर्जन स्थान में जाकर रुक गयीं। सभी नीचे उतर गए और बिलकुल सामने खड़े कैलाश-पर्वत को साष्टांग दण्डवत किया और फोटोग्राफ़ लेने लगे।
अधिकांश-यात्री सामने वाली पहाड़ी पर चढ़कर दर्शन करने जाने लगे तो मैं, नलिनाबेन और स्नेहलता भी उनके पीछे-पीछे चल दिए। वीना-मैसूर, ज्योत्सना शर्मा और रश्मि शर्मा जीप में ही बैठी रहीं।
हम धीरे-धीरे चढ़ते जा रहे थे पर सांस फूल रही थी। हमे पता नहीं था कि चढाई भी करनी पड़ेगी सो हम अपना बेंत लेकर नहीं आए थे। बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ रहे थे, पर आई.टी.बी.पी. के कमांडर की बात याद थी- ’एक सांस भरो एक कदम चढो।’ हम जब आधे रास्ते में थे तो एलओ लौटकर आ रहे थे।
लगभग आधे घंटे में हम उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ से कैलाश-पर्वत और नंदी-पर्वत के स्पष्ट दर्शन हो रहे थे। यूं तो कैलाश यहाँ से बहुत दूर थे पर स्पष्ट दर्शन हो रहे थे ऐसा लगता था कि अगली पहाड़ी पर ही शिव-धाम कैलाश है। यह कैलाश के दक्षिण-दर्शन हैं।
कैलाश-पर्वत अपनी दिव्य छटा बिखर रहे थे। धवल, शांत विशाल हिम-स्तूप मानों अपनी ओर खींच रहे हों! पर्वत के बीचोंबीच मुखाकृति और माला सी बनी मन को मोह रही थी।
हम एकटक देखते खुशी से इतने द्रवित हो गए कि आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे, बिलकुल शांत सुध-बुध खोकर उधर ही निहार रहे थे। कैलाश-पर्वत पर हिम भरा था तो समीप में नंदी-पर्वत बिलकुल कत्थई-भूरी चट्टान सा चमक रहा था। जुनेजा इत्यादि ने भोले की जयजयकार करके एकाग्रता तोड़ दी। हमने शिव-स्तुति की और धन्यवाद दिया प्रभु को जिनकी कृपा से दर्शन हो रहे थे।
सबसे बड़ी बात यह थी कि नीचे जहाँ जीप रुकी थी वहाँ एक नदी जमी पड़ी थी, माइनस डिग्री तापमान था पर कैलाश-पर्वत और नंदी-पर्वत के अलावा किसी पर्वत पर बर्फ़ नहीं थी।
जुनेजा, प्रकाशवीर अभी वहीं खड़े थे। असल में एलओ ने उन्हें अंत में वापिस आने के लिए कहा था। स्मरण रहे जुनेजा की यह चौथी बार की यात्रा थी। थोड़ी देर रुककर हम वापिस आ गए।
नीचे उतरते ही देखा कि कुछ यात्री नदी पार सामने की पहाड़ी पर चढ रहे थे, कुछ उपर शिखर पर पहुँच चुके थे।
उस हिम-रहित पहाड़ी पर जिनालय बना था भगवान ऋषभदेव ने वहाँ तपस्या की थी। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी भी कैलाश-दर्शन को आए थे। उन्होंने आठ पद चढ़कर मोक्ष प्राप्त कर लिया था। इसी लिए इस दर्शन का नाम अष्टपद-दर्शन है। जब उन्होंने प्राण त्यागे तो उनकी खड़ाऊं और छड़ी वहीं रखी थी जिसके आधार पर उनके पौत्र ने स्मारक बनवाया था। पर अब वहाँ खड़ाऊं और छड़ी नहीं थीं, बस जिनालय के नाम पर एक पत्थर से निर्मित झोंपड़ी थी। तिब्बती लोग समझते हैं कि तीर्थयात्री खड़ाऊं और छड़ी ले गए।
तीन धर्मों जैन-धर्म, बौद्ध-धर्म और सनातन धर्म में कैलाश-पर्वत के दर्शनों का बहुत महत्त्व है। भगवान बुद्ध भी कैलाश-परिक्रमा करने यहाँ पधारे थे इसलिए बौद्ध-अनुयायी भी यहाँ दर्शन और परिक्रमा करने आते हैं। सनातन-धर्म में तो कैलाश को देवादि-देव महादेव भगवान शंकर का निवास स्थान- मोक्ष का धाम बताया गया है।
जब तक सब लोग जिनालय-दर्शन करके आए तब तक हम जंगली-याक और चूहों इत्यादि के फोटो खींचते रहे। लगभग साढ़े पांच बजे एलओ ने सीटी बजाई और सभी को जीपों में बैठने को कहा। हमने एक बार और प्रभु-धाम में नमन किया, फोटो ली और आकर जीप में बैठ गए।
जीप और तेज दौड़ रहीं थी। उतरते में तो गति और ज़्यादा हवा से बातें कर रही थी। नीचे दारचैन शहर दिखायी दे रहा था।
साढ़े छः बजे हम वापिस दारचेन पहुँच गए। जाते ही जमाने वाले ठंडे पानी से हाथ-मुंह धोकर कुक द्रारा बनायी गयी चाय पी और बाहर फोन करने चले गए। एक खोखा में कोल्डड्रिंक बेचने वाले के यहाँ फोन सुविधा थी। अति संक्षिप्त में कुशल-क्षेम बताने पर भी चार यान खर्च हो गए।
लौटकर आए तो वीना-मैसूर कराह रहीं थीं उनकी तबियत ठीक नहीं थी। जल्दी से मधुप को बुलाया ब्लड-प्रैशर देखा थोड़ा हाई था। उन्होंने अपनी मेडिशन ली और आराम करने लगीं। हम और नलिनाबेन किचन की ओर चले गए। सुबह की सब्जी बची हुई थी, दाल-चावल बनवा लिए।
डिनर से पहले शिव-वंदना की और एलओ ने मींटिंग की। अगले दिन से तीन दिन की कैलाश-परिक्रमा को निकलना था। तीन-दिन का सामान ही साथ रखना था बाकी सब यहीं छोड़कर जाना था ताकि मार्ग में कठिनाई न हो। सुबह छःबजे बस से यात्रा आरंभ का समय बताया गया और दूसरे ग्रुप को नाश्ता तैयार करवाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी।
हम थके-हारे रात्रि भोजन के बाद सामान पैक करके बिस्तर पर पड़कर सो गए।

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2 Responses to “अष्टपद-दर्शन”

  1. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन Says:

    सभी भारतीय दर्शन-धाराओं के लिये समान महत्व रखने वाला कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र कब पराधीनता से मुक्त होगा?

    उ०- अवश्य होगा!

  2. prabha Says:

    kaas kabi me bhi ja saku

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