डेरापुख से जुथुलपुक (Zonzerbu)

कैलाश-परिक्रमा का दूसरा दिन
डेरापुख से जुथुलपुक जुथुलपुक(19/6/2010 सोलहवाँ दिन)
दूरी 22.9 किमी
वाया डोलमा-ला पास (कठिनतम और उच्चतम चढ़ाई)
डोल्मा-ला पास ऊँचाई 5750मीटर/19500 ft.

यह यात्रा-भाग पूरी यात्रा का सबसे कठिन और ऊँची चढ़ाई वाला भाग था। यहाँ मौसम पर निर्भर थे। कब बर्फ़ पड़ने लगे तो कब तेज बारिश! सो सुबह साढ़े तीन बजे कमरों में हलचल शुरु हो गयी। मैं उठी और टॉर्च और ब्रश इत्यादि सामान लेकर बाहर जाने लगी तो नलिनाबेन भी मेरे साथ चल पड़ीं। हम दोनों दैनिक-चर्या के लिए स्थान ढूंढ रहे थे पर हर जगह कोई न कोई था सो असमंजस्य में थे तभी गीताबेन ने हमें पीछे जलधारा के पास जाने को कहा वहाँ डेरापुख गांव के लोगों ने जलधारा से पाइप जोड़कर पानी निकालने की जुगत लगा रखी थी।
हम दोनों अंधेरे में डरते-डरते गए और फ़्रेश हो आए। पानी क्या बस बर्फ़ पिघली हुयी थी। जैसे-तैसे कंपकंपाते हुए मुंह-हाथ धोकर तैयार हुए और रसोई में आकर चाय और रस्क खाए। हॉट-चाकलेट भी थी।
एलओ और अन्य यात्री तैयार खड़े थे। पोर्टर्स भी आगए थे, मैं अपनी पोर्टर को पहचान न पायी। ठंड के कारण सभी मुंह ढके हुए थीं। पर उसने मेरे पास आकर मेरा बैग ले लिया।
एलओ और गुरु जल्दी मचा रहे थे। परिक्रमा पर जाने वाले सभी यात्रियों के आने पर एलओ ने सीटी बजाई और जयकारे के साथ सभी को आगे बढ़ने को कहा।
कुछ लोग यात्रा कठिन होने के कारण सब की सहमति से वापिस दारचेन जा रहे थे। गुरु ने उनको वहाँ पहुँचाने का प्रबंध कर दिया था।
हमने सवा चार बजे डेरापुख कैंप छोड़ दिया। मैं अपनी पोर्टर के साथ छड़ी के सहारे काफ़िले के साथ आगे बढ़ गयी।
शिवस्थल (यम का दरबार -यहाँ बैठकर यम सबका हिसाब करते हैं)-
जलधारा पार करके एक ऊँची पहाड़ी पर चढकर बिलकुल सुनसान निर्जन स्थान पर जहाँ हवा का वेगवान थी, पहुँच गए। वहीं पोनी भी खड़े थे। यात्रियों की सांस बुरी तरह फूल रही थी। सभी कहीं-कहीं दूर मिट्टी के टीलों पर बैठकर अपने को सामान्य बना रहे थे।
इतने ही मेरी पोनी वाली मेरे पास आकर मुझे पोनी पर बैठने का इशारा करने लगी। मैं उसे देखकर अति प्रसन्न हो गयी और तत्परता से उसके साथ जाकर पोनी पर बैठ गयी।
आगे कोई रास्ता या संकेत नहीं था। पठार और पर्वत का मिलाजुला विस्तार-क्षेत्र था। चारों ओर ऊँची-ऊँची विशाल पर्वत मालाएं फैली थीं। पहाड़ी और पठारी बड़े-बड़े टीलों/ढेरों के बीच कहीं-कहीं कंटीली झाड़ियाँ थीं, निकलने की बिलकुल जगह न थी, पोनी भी बहुत कठिनाई से निकल रहा था। पोनीवाली लड़की बड़ी मुश्किल से नियंत्रण कर रही थी बार-बार पोनी रुक जाता था या अपनी मर्जी से इधर-उधर मुड़ जाता था। मैं चुपचाप पोनी पर बैठी रही।
जब पोनी बहुत परेशान करने लगा तो उसने अपने साथ दूसरे पोनी वाले से कुछ कहा और सुना। उसके बाद वह पोनी को पोनी की मर्जी से चलाने लगी। वह अन्य खच्चरों से हटकर अलग रास्ता पकड़ लेता था। शायद भूखा भी था बार-बार झाड़ियों में से हरे पत्ते टूंगने लगता था। लड़की उसकी लगाम कसती तो आगे बढता।
हम लगभग साढ़े पांच हजार मीटर ऊंचाई पर बहुत ही दुर्गम रास्ते को पार करते जा रहे थे। हमें वहाँ कोई भी स्थानीय व्यक्ति या जानवर न मिला, पर इन टीलों में लोगों के पुराने कपड़े यहाँ-वहाँ फैले पड़े थे। कहते हैं यह शिव-स्थल है। यहाँ यमराज हमारे कर्मों का हिसाब करते हैं।
तीर्थयात्री अपने पुराने कपड़े यहाँ छोड़ जाते हैं। बड़ी संख्या में कपड़े और प्लास्टिक की बॉटल इधर-उधर फैली पड़ी थीं। बड़ा अफ़सोस हुआ यह देखकर! पर हमारे दल के किसी भी व्यक्ति ने कुछ भी सामान नहीं फेंका। हम सब प्रकृति को गंदा न करने की शपथ लेकर आए थे।
सवा दो घंटे तक ठंडी और तेज हवा के बीच उन पठारी टीलों को पार करके हम साढ़े छः के आसपास खड़ी ऊँची पहाड़ी पर चढ़ने लगे। चढ़ाई मानों किसी दीवार पर चढ़ रहे हों। पोनी बार-बार पीछे को आता मैं बड़ी मुश्किल से, पोनी की गर्दन तक अपना सिर झुकाए हुए संतुलन बनाए बैठी थी।
पोनीवाली का सांस फूल रहा था वह रुक-रुककर गहरी सांस लेती मैंने उससे उतरने की पेशकश की तो वह इशारे से मुझसे बैठए रहने को कहने लगी। साथ चल रहा गुरु भी बैठे रहने को कहने लगा।
डोलमा-ला पास (लगभग 4 किमी)
सात बजे हम 5750 मीटर की ऊँचाई पर पहुँच गए। थोड़ा सा ही आगे जाने पर लड़की ने मुझे पोनी से उतार दिया और स्वयं अन्य पोनी वालों के साथ चली गयी। पोर्टर मेरे साथ रही।
मैं कुछ पल के लिए खड़ी देखती रही। चहुँ ओर से उच्च्चतम पर्वत-मालाओं से घिरा, फैली हुयी विशालाकार चट्टानों/शिलाओं से पटा पड़ा विशाल दर्रा – डोलमा-ला पास!!!
शिलाओं और चट्टानों के बीच- बीच में बर्फ़ जमीं थी। बर्फ़ पर बहुत फिसलन थी। हवा बर्फ़ीले तूफ़ान के रुप में थी। सांस घुट रही थी। कोई जगह चलने के लिए नहीं थी।
यात्री बर्फ़ से बचते हुए वहीं-कहीं बड़ा सा पत्थर देखकर उसपर बैठते जा रहे थे। मैं भी वहीं बैठ गयी। भगवान को प्रणाम किया और अपने बैग से ड्राई-फ्रूट का पैकेट निकालकर खाया और थोड़ा पोर्टर को दिया।
पोर्टर आगे बढ़ने की जल्दी मचा रही थी। वह बार-बार मेरा हाथ पकड़ती और उठने का इशारा करती उसके साथी पोर्टर उसे बुला रहे थे। मैंने भी सोचा आगे बढ़ ही लिया जाए। सो एक हाथ में बेंत और दूसरे से पोरटर का हाथ पकड़कर एक चट्टान से दूसरी चट्टान पर पैर रखती चलने लगी।
अब हम नीचे की ओर जा रहे थे। प्रकृति के अनोखे-दृश्य देखते चटटानों/शिलाखंडों पर छलांग लगाते उतरते जा रहे थे। कुछ दूर जाने पर दाँयीं ओर नीचे घाटी में चारों ओर से पर्वत मालाओं से घिरा हिम-मंडित “गौरी कुंड” दिखायी दिया। कहते हैं मां पार्वती का स्नान-स्थल है वह, जहाँ पर्वतीजी ने अपने मैल से गणेशजी को उत्पन्न किया और पहरेदारी करने बैठा दिए। जब गणेशजी ने भगवान शंकर के प्रवेश पर ही रोक लगा दी तो शिव ने उनके सिर को धड़ से अलग कर दिया। तत्पश्चात पार्वती के रुदन से द्रवित होकर शिव ने गणेश के गज का मुख प्रत्यारोपित करके उन्हें गजानन बना दिया।
हम नतमस्तक हुए और प्रभु का स्मरण करके आगे बढ़ गए।
पत्थरों पर चढ़ते-उतरते पैर और घुटने बिलकुल बेहाल थे पर प्राकृतिक-छटा का दिव्य रुप मन मोह लेने वाला था।
पर्वतों की चट्टानों के प्राकृतिक-डिजाइन पच्चीकारी स्तब्ध कर रहीं थीं, मंत्र-मुग्ध कर रही थी। कहीं-कहीं चट्टानें पताका रुप में पर्वत-शिखर पर लहरा रहीं थीं!
पथरीले मार्ग से उतरने का अंत मिट्टी के सूखे टीलों से उतरने के साथ था। बिल्कुल रेतीले पठारी मिट्टी के खड़े उतार से उतरने में मैं बार-बार फिसल जाती। संतुलन बन ही न रहा था। मेरी पोर्टर इतनी छोटी थी कि अगर मैं उसका सहारा लेती तो वह भी मेरे साथ ही गिर जाती:)
उसने एक अकेले जाते पोर्टर से मुझे हाथ पकड़कर उतारने के लिए कहा तब कहीं जाकर मैं नीचे ल्हाचू घाटी में पहुँची।
नीचे विश्राम हेतु समतल स्थान था। कई सहयात्री आकर बैठे हुए थे। गुरु ने कुछ समय निश्चित किया था वहाँ से निकलने का। मैं भी एक ऊँची सी जगह पर बैठ गयी।
वहाँ एक छोटी सी दुकान भी थी जिसमें कोल्डड्रिंक, पानी के बॉटल और चाक्लेट इत्यादि मिल रहे थे। तिब्बती दुकानदार तीर्थयात्रियों को सामान दुगुनी क़ीमत में दे रहा था जबकि अपने पोनीवाले और पोर्टर्स को कम क़ीमत में। मैंने पोर्टर से कोल्डड्रिंक की तीन बोतल मंगवायीं। एक अपने लिए और दो पोनीवाली और पोरटर के लिए। पोर्टर अपने लोगों के साथ खाना खाने चली गयी वही मुझे अपनी पोनी वाली भी बैठी दिखायी दी।
थोड़ी देर में पहले बैठे यात्री चल पड़े, उसके कुछ देर में मेरी पोर्टर भी अगयी और मुझे खींचकर लेजाने लगी। रास्ता गीला था, तभी पोनी वाली आयी और उसे डांटकर (बोलने के टोन से पता चल गया) मुझे आराम से पकड़कर थोड़ा आगे ले गयी जहाँ पोनी चर रहे थे। उसने मुझे बहुत आराम से अन्य पोनी वाले की सहयता से पोनी पर बैठाया और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
हम मिट्टी के ढ़ेरों वाली उबड़-खाबड़ उतार-चढ़ाव रहित घाटी में चल रहे थे। बायी ओर मंद-मंद बहती नदी थी जिसकी लहरों पर सूर्य की किरणें मानों छटपटा रही हों।
दायीं ओर कैलाश-धाम के दर्शन हो रहे थे। भूरे रंग के पहड़ों के बीच कत्थई धारियों से सुसज्जित धवल कैलाश मानों वलयपूर्ण हों।
हम उस सुनसान निर्जन, वनस्पति-विहीन घाटी में जहाँ जीवन के संकेत के नाम पर नदी थी, में चलते-चलते उबते हुए एक बजे के आसपास जुलुत्पूजुथुलपुक कैंप पहुँचे।
नदी किनारे थोड़ी दूर पर सामने एक लाइन में कई कमरे बने थे प्रत्येक कमरे में पांच बिस्तर लगे थे। पीने के लिए गर्मपानी का जग रखा था पर यहाँ भी टॉयलेट या बाथरुम नहीं थे। कमरों के पीछे खुले में एक ओर महिलाएं और दूसरी ओर पुरुष टॉयलेट की तरह जा सकते थे।
ऊपर की ओर एक बौद्ध-मठ था जहाँ पोनीवालों और पोर्टर्स के ठहरने के लिए टैंट लगे थे।
एलओ अभी पहुँचे नहीं थे पर कुछ यात्री पहुँच चुके थे सो किसी भी कमरे में आराम कर रहे थे। मैं भी एक खाली कमरे में बिस्तर पर लेट गयी। कुछ ही देर में एलओ ने पहुँचकर कमरे एवं सहयात्री बताए। मैं, श्रीमती-दंपत्ती और त्यागी दंपती एक कमरे में ठहरे।
एक टेंट रसोई के लिए था। कुक ने आकर बर्तन इतयादि खोले और चूल्हा सेट करके चाय पिलायी। रश्मि खंडूरी और ज्योत्सना शर्मा ने रेडीमेड राजमा-चावल के पैकेट्स से सभी को लंच कराया। सभी थके हारे थे चुपचाप सो गए।
प्रकाशवीर और सुरेश इत्यादि ने शाम की चाय बनायी और तीनों कुक द्वारा सभी के कमरों में सर्व करादी।
आज सभी बहुत प्रसन्न थे क्योंकि शिव की कृपा से यात्रा का कठिनतम भाग भी निर्विघ्न पूरा हो गया था। सभी सकुशल रहे और मौसम हमेशा अनुकूल बना रहा। सारी यात्रा मौसम पर ही तो निर्भर थी।
शाम को फिर वही राजमा-चावल के पैकेट्स गर्मपानी में डाले और सर्व किए गए पर कुछ यात्रियों से वह न निगले गए तो स्वयं आधी रात में मैगी बनाकर खा गए।:-)
शाम को अशोक कुमार, के.के.सिंह और मधुप इत्यादि ने अपने कमरे में सुंदरकांड का पाठ किया और एलओ ने मींटिंग की। सुबह पांच बजे प्रस्थान का समय बताया और हमारे ग्रुप को सुबह के चाय-नाश्ते की जिम्मेवारी सौंपी।
नलिनाबेन, श्रीमति दंपत्ती और मैंने रात को ही कुक को सुबह के नाश्ते और चाय के बारे में समझा दिया। वापिस आकर हम सुबह तीन बजे उठने के लिए बिस्तर पर सो गए।

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