किहु से तकलाकोट

25/6/2010 बाइसवाँ दिन
(वापसी)

किहु से तकलाकोट

सुबह साढ़े पांच बजे उठकर दैनिकचर्या से निपटकर मैं अपना कैमरा लेकर मानस की ओर चली गयी।
मानस का जल मानों स्वर्ण-रजत जलाशय!!! प्रातः के सूर्य ने अपनी रश्मियाँ मानो मानस की लहरों पर बिछा दी हों!
या रश्मियाँ और लहरें एक-दूसरे को पकड़ने दौड़ रहीं हों!!! मानस का अलौकिक दिव्य स्वरुप सचमुच देव-सरोवर!
आकाश में बादल घिरने लगे और सूर्य को ढ़क लिया। सूर्य छिपकर भी अपनी किरणें फैलाता रहा। देखकर लगता था मानों बादलों के किनारे प्रकाश फैला रहे हों।
हमने दृश्यों को कैमरे में भरा और वापिस आकर तैयार होकर चाय नाश्ता किया। बस सामने ही खड़ी थी। यात्री अपना सामान रखकर सीट निर्धारित कर रहे थे।
सात बजे एलओ की सीटी बज गयी। बस में बैठने को कहा गया। प्रकाशवीर ने जयकारे लगवाए। सब जयकारे लगाते हुए भी मानस की छवि को आँखों में हमेशा के लिए भर लेना चाहते थे।
सवा सात बजे बस चल पड़ी। जब हमारी बस जा रही थी तो पास ही बने रेस्टोरेंट/बार की कर्मचारी हमें हाथ हिलाकर बाय-बाय कर रहीं थीं।
हमारी बस मानस और स्कंद की मोनेस्ट्री को पीछे छोड़कर आगे दौड़ रही थी। थोड़ी देर में मानस दिखायी देनी बंद हो गयी और राक्षस-ताल दिखायी देने लगी। कुछ लोग राक्षस ताल में स्नान करना चाहते थे पर गुरु ने मनाकर दिया वहाँ स्नान करना मना था।
रास्ते में बीच-बीच में एक दो गाँव भी नज़र आए, पठारी और पहाड़ी क्षेत्र का सौंदर्य हमें पलक झपकने नहीं देता था। बस दौड़ रही थी और हम बाहर देख रहे थे।
ज़ोरावर सिंह की समाधि

लगभग पौने नौ बजे के आसपास हमारी बस सड़क के बायीं ओर साइड में जाकर खड़ी हो गयी। गुरु ने सभी से नीचे उतरने को कहा। थोड़ा सा लगभग सौ मीटर अंदर जंगल में गए। वहाँ छोटे-छोटे पत्थरों को चुनकर गेरु जैसे रंग से पुता हुआ एक मंच/चबूतरा सा बना हुआ था। जिस पर मठ की भांति तिब्बती-परंपरा की तरह कपड़ों की झंडियाँ बांधी हुयी थीं।
हम सभी वहाँ एकत्र हो गए। तब गुरु ने बताया कि वह ’तोय’ गांव है और वह चबूतरा भारत के वीर बलिदानी सेना-नायक ज़ोरावरसिंह की समाधि है। वीर ज़ोरावर सिंह लद्दाख को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाने के अभियान का हीरो था।
स्थानीय भाषा में उसे सिंगलाका चौतरा कहा जाता है। गुरु के अनुसार स्थानीय लोगों में उस समाधि की बड़ी मान्यता है। वहाँ समाधि पर आने से उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होजाती हैं।
हम सभी ने सच्चे मन से उस सैनानी को अपनी विनम्र श्रद्धांजली अर्पित की और सामूहिक-रुप से उच्च स्वर में अपना राष्ट्रीय-गान गाया। पूरे दल का ग्रुप-फोटो खींचा गया और अपने-अपने चित्राकंन का तो कहना ही क्या।
ज़ोरावर सिंह की याद को मन में संजोय हम बस में बैठकर पुनः तकलाकोट की ओर बढ़ गए।
पंद्रह-बीस मिनट में ही हम तकलाकोट के उसी गेस्ट-हाऊस में पहुँच गए। पर यह क्या! हमारे लिए निश्चित कमरों में प्रायवेट यात्री ठहरे हुए थे। हमारे एलओ बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने गुरु से संयत भाषा में अपनी आपत्ति दर्ज़ करायी और अधिकारिक तौर पर कमरों की मांग की।
थोड़ी देर तक हम सब रिसेप्शन पर ही बैठे रहे। लगभग आधा घंटे बहुत ज़द्दोज़हद के बाद कमरे खाली हुए पर उनमें सफ़ाई नहीं थी, बहुत गंदे थे। इस चक्कर में हम सब नहा नहीं पाए। हमें देर हो रही थी।
खोजरनाथमंदिर/खोर्चकनाथमंदिर
सामान कमरे में रखा और जल्दी से कपड़े बदले और पुनः उसी बस में बैठकर सभी यात्री समीप ही उन्नीस किमी दूर खोजरनाथमंदिर/खोर्चकनाथमंदिर के दर्शन करने चले गए।
मंदिर में आदमकदसे भी बड़ी तीन मूर्तियाँ थीं जिनको गुरु ने राम,लक्षमण और सीता बताया। बीच में राम, बाएं सीता तो दांए लक्षमण। हालांकि बाहर बोर्ड पर उसे खोर्चकसीट मोनेस्ट्री ही लिखा है पर विग्रहों की बनावट और सजावट राम,लक्ष्मण और सीता जैसी ही है।
मंदिर में अंधेरा था पर घी के बड़े-बड़े दीपक जल रहे थे। यात्रियों को भी दीपक खरीदकर आरती करने की सुविधा थी। हमसब ने भी दीपक जलाए। मंदिर में युवान के साथ-साथ रुपया भी लिया जा रहा था।
मंदिर में अंदर मूर्तियों के सिंहासन के चारों ओर अति संकीर्ण परिक्रमा-मार्ग था जिसमें बिलकुल गुपागुप्प अंधेरा था। पहले तो डर लगा फिर चले गए अंदर और परिक्रमा करके बाहर आगए।
मंदिर के दायीं ओर एक कक्ष में भगवान बुद्ध की ध्यानस्थ-मुद्रा में मूर्ति विराजित थी। हमसब ने वहाँ भी मस्तक झुकाकर नमस्कार किया और मंदिर का पुस्तकालय देखा और बाहर आगए।
बाहर मैन गेट के पास ही मंदिर के प्रबंधक की ओर से हमसब यात्रियों को चाय पिलायी गयी।वहीं एक छोटी सी कोठरी में मंदिर और कैलाश-मानसरोवर के पोस्टर और चित्रों के अतिरिक्त पूजा की अन्य सामग्री भी बिक रही थी। हमने मंदिर के चित्र और हवन सामग्री खरीदी।
कुछ सहयात्री खरीददारी कर रहे थे कुछ बाहर बस के पास आगए थे। बाहर छोटे-छोटे तिब्बती बच्चे जिनकी दशा फटेहाल थी, पास आकर कुछ लेने की इच्छा रख रहे थे। हमसबने उन्हें दो-दो, पांच-पांच युवान दिए, बैग में रखे बिस्कुट भी बांट दिए। बच्चे मुस्करती हुए चले गए।
एक बजे के करीब हम वापिस गेस्ट हाऊस आगए। मैं, नलिनाबेन और स्नेहलता एक कमरे में ठहरे थे। बाथरुम में पानी आरहा था। हमने गीज़र ओन किया कुछ देर बातचीत करके तीनों ठीक से नहाए और कपड़े धो डाले।
तबतक गुरु ने लंच करने को बुलालिया था। हम डाइंनिंग-रुम में चले गए। वही चीनी स्त्री और वही फीके चावल और सूप वाला लंच। हमने लंच किया और वापिस आकर कमरे में सो गए। शाम को भी वही चाय, तली हुयी मूंगफली, साबूदाने के पापड़ और और टोस्ट।
शाम को पांच बजे सभा-कक्ष में एलओ की मीटिंग थी। सबसे पहले तो सभी ने भगवान का नाम लिया, कीर्तन हुआ। तत्पश्चात एलओ ने विचार रखा कि हमारी तीर्थयात्रा निर्विघ्न समाप्त होने की खुशी में हमें अपने सहायक सभी चीनी कर्मचारियों को इनाम में कुछ-कुछ राशि देकर जानी चाहिए ताकि यहाँ के लोग हमें अच्छे व्यवहार के लिए याद रखे और आने वाले यात्रियों के साथ अच्छा सलूक करें। सभी ने एक स्वर में सहमति जतायी। कुछ लोग गेस्टहाऊस कर्मचारियों से खफ़ा थे पर जब सबने अपना बर्ताव सही करने की बात रखी तो वे सब भी मान गए।
तीनों गाइड, ड्राइवर, तीनों कुक और गेस्टहाऊस की तीन कर्मचारी सभी को अगले दिन की मीटिंग में सम्मानित करने का निर्णय लिया।
रात के खाने में चावल, सब्जी और सूप के अलावा कटे हुए पैक्ड फ्रूट्स भी सर्व किए गए। और दिन की अपेक्षा उस दिन किचेन वाली दोनों चीनी महिलाओं का व्यवहार भी अच्छा था। हमने खाना खाया और वापिस कमरे में आकर सो गए। अगले दिन कोई जल्दी नहीं थी। तकलाकोट में ही ठहरना था।

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