गुंजी से बुद्धि

गुंजी से बुद्धि
29/6/2010 छब्बीसवाँ दिन
गुंजी>सीती>गर्ब्यांग>छियालेख>बुद्धि

सुबह पाँच बजे कमरे में ही चाय आ गयी हम उठे और दैनिक कार्यों से निपटकर हाथ-मुंह धोकर तैयार हो गए। बाहर हल्की बूंदाबांदी भी हो रही थी, नहाने के लिए पानी गर्म न हो सका।
नाश्ता तैयार हो गया था, नाश्ते में पोहा और मीठा दलिया था। यात्री भोजन-कक्ष में पहुँच रहे थे। साढ़े छः बजे सभी तैयार होकर अपने बैग के साथ अहाते में खड़े हो गए।
एलओ ने निगम कर्मचारियों को बुलाया और पूरे दल की ओर से सभी का धन्यवाद किया और लिफ़ाफ़े भेंट करके विदा ली।
मैं पोर्टर के साथ काली नदी के किनारे पैदल ही आगे बढ़ गयी। सभी यात्रियों के पोनी वाले मिल गए पर मेरा वाला दिखायी नहीं दिया। मैंने अन्य पोनीवालों से पूछा तो पता चला कि उसका पोनी कहीं दूर पहाड़ी पर भाग गया था वह उसे ढूंढकर पकड़ने गया था। मैं पैदल ही चलती रही। बीच-बीच में कई खाली जा रहे पोनी वाले मुझसे अपने पोनी पर बैठाने की ज़िद्द करते रहे पर मैं अन्य पैदल जा रहे सहयात्रियों के साथ आगे बढ़ती रही।
काली नदी का पुलपार करने के बाद पोनीवाला पोनी को भगाता हुआ आया और मेरे पास रुक गया। मैं पोनी पर बैठ गयी।
साढ़े सात बजे हम सीती गाँव आ गया जहाँ जाते समय हमने लंच किया था। पहले से ही कई यात्री वहाँ बैठे हुए थे। मैं भी पोनी से उतरकर वहाँ बैठ गयी।
पोनी और पोर्टर वालों को मैंने चाय और खाने के पैसे दे दिए वे दोनो खाना खाने चले गए। कुछ यात्री भी अपने पैसे से चाय पी रहे थे, पर मेरा मन नहीं था सो वहाँ बैठी एक छोटी सी डॉगी की क्रिड़ाएँ देखती रही। वह सब यात्रियों के पास आकर कुछ कह रही थी। सभी प्यार से उस पर हाथ फेर देते थे। पोनीवाला और पोर्टर दोनों खाना खाकर जल्दी ही आ गए और हम वहाँ से चल दिए।
मौसम साफ़ था धूप तेज थी, खुली धूप में गर्मी भी हो रही थी पर नदी किनारे चलते चलते प्रकृति मनमोह रही थी। चलते चलते हम गर्ब्यांग आयटीबीपी चौकी पर पहुँचे। सिपाहियों ने इशारे से पोनी वाले को मुझे उतारकर साइड में कार्ड चैक कराने जाने को कहा और मुझे बीच में पड़ी कुर्सियों तक ले गए,वहाँ अन्य सहयात्री भी बैठे हुए थे। वहाँ गर्म पानी, चाय और चिप्स सर्व किए गए। वहीं हमें पाँचवें दल के तीर्थयात्री भी मिले, हम सबने उन्हें यात्रा निर्विघ्न पूरी करने हेतु शुभकामनाएँ दीं और हौंसला बढ़ाया।
थोड़ी देर में पोनी और पोर्टर आगए। मैं पोनी पर बैठकर आगे चल पड़ी। रास्ते में पाँचवें दल के और भी सदस्य मिलते रहे और हम उनसे ’ऊँ नमःशिवाय’ कहकर आगे बढते रहे।
गर्ब्यांग गाँव की गीली गलियों से जाते समय पहाड़ियों पर बने उनके पंक्तिबद्ध घर दर्शनीय थे। जाते समय की तुलना में अब ज़्यादा रौनक थी। शायद मौसम ठीक और यात्रियों की आवाजाही बढ़ने के कारण ग्रामवासी भी गांव में आगए थे।
गर्ब्यांग से आगे ऊँची चढ़ाई थी जहाँ बहुत संकरा रास्ता था जहाँ मेरा पोनी फिसल गया था और मैं गिरते से बाल-बाल बच गयी।
और आगे बढ़े तो फिर वही हरियाली से भरी छियालेख घाटी। जाने के समय की अपेक्षा अब कहीं अधिक हरियाली थी। जंगली फूल खिले थे। सौंदर्य मारक था! पैदल चलने वाले सहयात्री रुक-रुककर दृश्यों को निहार रहे थे।
साढ़े बारह बजे बुद्धि गाँव दिखायी देने लगा और एक बजे हम बुद्धि-कैंप पहुँच गए।बुद्धि कैंप की क्यारियों में में बहुत सुंदर हर रंग के फूल खिले थे। पहुँते ही बुरांस का शर्बत पीने को मिला। पहले से पता होने के कारण हम सीधे अपने कमरे में पहुँचे, जहाँ सहयात्री श्रीमती और चंदन पहले से पहुँचकर आराम कर रहे थे।
पूरी यात्रा मे आज पहली बार गर्मी लगी थी, जी उकता रहा था। हमने अपने पोर्टर से नहाने के लिए गर्म पानी का प्रबंध करने को कहा। वह रसोई में गया और निगम के कर्मचारी से पूछ्कर पीछे की ओर बाथरुम के पास ही पत्थर रखकर बनाए गए चूल्हे पर भिगोने में पानी गर्म होने रख गया। पानी गर्म होने पर मैं नहायी जिससे तबियत ठीक हुयी। इतने ही नलिना भी आ गयी मैंने उन्हें भी पानी गर्म बता दिया।
धीरे-धीरे सभी यात्री पहुँच गए। दोपहर का खाना तैयार होकर भोजन-कक्ष में लग गया था, खाने में दाल,चावल, कढ़ी, रायता रोटी, अचार इत्यादि सबकुछ था। खाना खाकर हम अपने कमरे में आकर सो गए।
चार बजे कमरे में चाय देने आए निगम कर्मचारी की खटखटाहट से हम सब की आँख खुलीं। दरवाज़ा खुलने पर पता चला कि जब सोए थे तो धूप थी और शाम को तेज बारिश हो चुकी थी। गहरे बादल घिरे हुए थे।
मैं, नलिना और स्नेह कमरे के खुले दरवाज़े से दूर पहाड़ी दृश्यों का आनंद उठाते बातचीत कर रहे थे तभी एक कुत्ता आकर हमारे दरवाजे पर खड़ा हो गया शायद कैंप में ही रहता होगा, बिलकुल मित्रभाव से हमसब की ओर देखता हुआ पूंछ हिलाने लगा। हमने उसे बिस्किट खाने को डाल दिए; स्नेहलता को डर था कि कहीं ज़्यादा दुलारने पर वह ऊपर बिस्तर पर ही न चढ़ जाए सो वह उसे भगाना चाहती थी, पर मेरे और नलिना के न मानने पर स्वयं मुंह ढ़ककर लेट गयी। तब कुता भी वहाँ से चल गया।
थोड़ी देर में मैं अपना कैमरा लेकर बाहर गयी और कुछ चित्र अपने कैमरे में संजोए। बूंदाबांदी फिर शुरु हो गयी थी सो वापिस अपने कमरे में आगयी।
साढ़े सात बजे भोजन-कक्ष में ही एलओ ने मीटिंग रखी। सभी एकत्र हुए और शिव-वंदना से प्रारंभ करके अगले दिन की यात्रा के विषय में चर्चा की। अगले दिन की यात्रा सुबह छः बजे शुरु होनी थी। नाश्ता मालप में मिलना था।
हमने खाना खाया और रसोई में निगम कर्मचारी से सुबह स्नान हेतु जल्दी पानी गर्म करने का विनम्र आग्रह किया। वह कर्मचारी इतने सहयोगी थे कि कुआ बताएँ एकदम बोल उठे- ”हाँ-हाँ मैडम हो जाएगा।” हम उनका धन्यवाद करके वापिस अपने कमरे में आकर सो गए।

4 Responses to “गुंजी से बुद्धि”

  1. Zakir Ali Rajnish Says:

    बहुत सुंदर।

    ———
    कौमार्य के प्रमाण पत्र की ज़रूरत किसे है?
    ब्‍लॉग समीक्षा का 17वाँ एपीसोड।

  2. Zakir Ali Rajnish Says:

    अच्‍छा लगा जानकर।

    ———
    कौमार्य के प्रमाण पत्र की ज़रूरत किसे है?
    ब्‍लॉग समीक्षा का 17वाँ एपीसोड।

  3. Zakir Ali Rajnish Says:

    अच्‍छा लगा पढकर।

    ———
    कौमार्य के प्रमाण पत्र की ज़रूरत किसे है?
    ब्‍लॉग समीक्षा का 17वाँ एपीसोड।

  4. Smart Indian - अनुराग शर्मा Says:

    स्नेहलता को डर था कि कहीं ज़्यादा दुलारने पर वह ऊपर बिस्तर पर ही न चढ़ जाए सो वह उसे भगाना चाहती थी, पर मेरे और नलिना के न मानने पर स्वयं मुंह ढ़ककर लेट गयी। तब कुता भी वहाँ से चल गया।

    रोचक! मुझे लगता है कि हिमालय में वनस्पति से लेकर मनुष्य तक सभी स्वभावत: मित्रवत होते हैं

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