धारचूला से जागेश्वर

01/7/2010 अट्ठाइसवाँ दिन

धारचूला से जागेश्वर
धारचूला>मिरथी>पाताल-भुवनेश्वर>जागेश्वर

सुबह साढ़े चार बजे आँख खुलगयी। मैंने बाथरुम में गीजर ऑन कर दिया, और लगेज खोलकर दो जोड़ी कपड़े निकाल लिए एक तभी पहनने के लिए और एक अगले दिन के लिए क्योंकि अब लगेज दिल्ली जाकर ही मिलना था।
स्नान-ध्यान करके उतारे हुए कपड़े और अन्य सामान रेनकोट इत्यादि भी बैग्स में पैक कर दिए। नलिना नहाने गयीं तो मैं उनके और अपने लिए नीचे भोजन कक्ष से चाय लेने चली गयी।
वहाँ मेरा पोर्टर भी काम कर रहा था। मुझे देखते ही नमस्ते की और चाय लेकर मेरे साथ कमरे तक पहुँचाने आगया। मैंने उससे लगेज के बोरों को रस्सी से बंधवाकर नीचे रिसेप्शन-हाल में पहुँचवा दिया।
थोड़ी देर में मैं, नलिना, स्नेहलता और वीना मैसूर नीचे आए, भोजन-कक्ष में और भी कई यात्री चाय पी रहे थे हम भी दोबारा चाय लेकर वहीं कुर्सियों पर बैठ गए। थोड़ी देर में नाश्ता लग गया। छोले-आलू की चटपटी सब्जी, दही, अचार, पूरी और मीठी सैवैंयाँ – सभी ने छ्ककर खाया🙂 अब कोई डर नहीं था बीमार होने का।
नाश्ता करके हमने देखा कि कुछ यात्री रिसेप्शन-काऊंटर पर कुछ खरीददारी कर रहे थे, हम भी वहाँ पहुँच गए और तीन टीशर्ट और कुमाऊँ के दर्शनीय-स्थलों के कुछ पोस्टर्स खरीद लिए।
एलओ सहित सभी यात्री बाहर अहाते में एकत्र हुए। गेस्टहाऊस के कर्मचारियों को बुलाया उनका धन्यवाद किया और स्नेह से लिफ़ाफ़े भेंट कर उनसे विदा ली।
भोले के जयकारे लगाए और आते समय की तरह ही अपनी-अपनी बस में बैठ गए। हमारी बस में कु.मं.वि.नि. का गाइड था तो दूसरी में एलओ स्वयं।
बस काली नदी के किनारे चलती हुई मिरथी की ओर जा रही थी।

मिरथी से विदाई

साढ़े आठ बजे हम मिरथी जाते समय एक दोराहे पर पहुँच गए। जहाँ से मिरथी जाने वाली सड़क पर आयटीबीपी की लाल झंडा लगी जीप खड़ी थी। वह जीप हमें लेने आयी हुई थी। हमारे ड्राइवर को अपने पीछे आने का इशारा करके आगे-आगे चलने लगी।
पौने नौ बजे हम मिरथी के आयटीबीपी बेस कैंप में प्रवेश कर गए। गेट से ही रिसीव करने के लिए रास्ते के दोनों ओर सिपाही पंक्तिबद्ध होकर खड़े थे तो कमांडर इन चीफ़ श्री निंबाड़ियाजी स्वयं स्वागत के लिए उपस्थित थे।
स्वागत-कक्ष तक जाने के लिए रास्ते में लाल कालीन बिछे थे। जवान ऐसे भाग-भागकर ध्यान रख रहे थे मानो कोई वीआईपी आए हों। हम सब उनके स्वागत से पुनः बहुत गदगद थे।
सबसे पहले कोल्डड्रिंक, फिर गर्मागर्म जलेबी, पनीर-टिक्का, मिक्स पकौड़े मूंग की दाल का हलवा और चाय-कॉफ़ी सभी कुछ सुंदर ढ़ंग से परोसा गया था। जवान बड़े आदर और स्नेह से ज़िद्द करके खाने को कह रहे थे।
खाते समय वहीं एलसीडी पर हमारी यात्रा के सीडी भी दिखाई जा रही थी। यात्री दोनों का आनंद उठा रहे थे।
जलपान के बाद सभा-कक्ष में एकत्र हुए जहाँ आयटीबीपी के विभिन्न विभागों (जैसे संचार,
चिकित्सा,सुरक्षा इत्यादि) के अफ़सरों ने संबोधित किया और अपने-अपने कार्यों की समीक्षा की। प्रत्येक यात्री से निजी अनुभव के आधार पर निश्चित परफ़ोर्मा पर यात्रा-संबंधी फ़ीड बैक लिया।
हम आयटीबीपी के हृदय से आभारी हैं जिंहोने यात्रा-काल में प्रतिदिन हमारे परिवार-जनों को ई-मेल भेजकर हमारी कुशल-क्षेम बतायी।
तत्पश्चात श्री निंबाड़ियाजी ने पूरे दल की यात्रा निर्विघ्न पूर्ण करने की बधाई दी और कै.मा.यात्रा पूर्ण करने पर सभी को अपने हाथों से एक-एक पीतल का बैच, अपनी स्वयं की संपादित पुस्तक ”कुमाऊँ और कैलाश एक संस्कृति और सत्य” और दल का ग्रुप फोटो भेंट किया। हम सब उनके हाथों से इतने सम्मान को पाकर फूले न समा रहे थे।
यात्री-अनुभव वर्णन के अंतर्गत मैंने और सहयात्री श्री सिंह ने अपनी बात रखी। मैंने आयटीबीपी के सहयोग को यात्रा पूरी कराने का श्रेय दिया पर यात्रा का रास्ता ठीक कराने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
इसके बाद एलओ ने आभार प्रकट करते हुए आयटीबीपुलिस-बल की सातवीं वाहिनी की सेवा और सहयोग हेतु सराहना की; अपने दल की ओर से कुछ धन राशि जवानों को मीठा मुंह करने के लिए सप्रेम भेंट दी और कुछ राशि उन स्कूली बालिकाओं के लिए भी दी जिन्होंने जाते समय बड़े भावपूर्ण ढंग से हम सब का स्वागत किया था और हमारा हौंसला बढ़ाया था।
अंत में पुनः श्री निंबाड़िया जी ने सभी से पवित्र कैलाश-यात्रा पर जाने के लिए लोगों को प्रेरित करने की सलाह दी और हम सब को ससम्मान विदा किया।
लगभग ग्यारह बजे हम बसों में बैठकर मिरथी से चल पड़े। उतराई और चढ़ाई वाले रास्ते पार करते हुए तीन बजकर पचास मिनट पर हम पाताल-भुवनेश्वर पहुँचे।
पाताल-भुवनेश्वर एक प्राचीन गुफ़ा है, जिसका प्रवेश-स्थान बहुत छोटा है। बहुत मोटे और लंबे-चौड़े या सांस फूलने से परेशान लोग वहाँ घुस नहीं पाते हैं।
हमारे दल से भी कई लोग अंदर नहीं गए, कई को पुजारी ने ही न जाने की सलाह दी।
हम तो अंदर चले गए और लगभग चालीस मिनट अंदर ही पूरी गुफ़ा देखते रहे; सभी के साथ पाताल-भुवनेश्वर की पूजा की और शिवलिंग पर जल चढ़ाया।
पाताल-भुवनेश्वर के पास में ही कुमंवि निगम के गेस्ट-हाऊस में हमारे दोपहर के भोजन का प्रबंध था, जहाँ सुस्वादु ताजा गर्मा-गर्म लंच किया और आगे बढ़ चले।
साढ़े चार बजे हमारी बसें जागेश्वर के लिए चल पड़ीं। शुरु में तो सबने खाना खाया था तो सो गए। फिर आपस में बातचीत करते रहे पर बस कहीं भी न रुक रही थी। हम सब सोचते रहे थे कि अब रुकेगी, तब रुकेगी, पर बस वाला गोल-गोल रास्तों पर घुमाए जा रहा था।
आठ बजे के आसपास यात्रियों ने शोर मचाकर बस रुकवायी तब जाकर लोग लघुशंका से निपटकर आए। बस में बैठे-बैठे जी घबराने लगा। सभी बहुत बेचैन होने लगे पर क्या करते थके हारे बैठे रहे। हम सब बार-बार गाइड से पूछते ’कितनी दूर और है?’ तो वह हर बार ’थोड़ी सी दूर और है’ कहकर टाल देता।
रात के अंधेरे में ड्राइवर पहाड़ी रास्तों पर लगातार बस दौड़ा रहा था। हम सब की हिम्मत जवाब दे चुकी थी पर ड्राइवर की हिम्मत को देखते हुए मौन थे।
रात को साढ़े ग्यारह बजे जब बस रुकी और गाइड ने कहा ’ जागेश्वर पहुँच गए हैं, सामने गेस्ट हाऊस है सभी उतरकर पहुँच जाए’ हम अपना बैग उठाकर नीचे उतरे तो घुटने बिलकुल जाम हो गए थे, थकान से शरीर निढ़ाल हो रहा था सो एलओ ने जैसे ही कमरे बताए हम खाना बिना खाए ही अपने कमरे में जाकर जूते उतार कर बिस्तर पर पड़कर सो गए।

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One Response to “धारचूला से जागेश्वर”

  1. Smart Indian - अनुराग शर्मा Says:

    आशावादी पर्वतीय अंचल में दूरी सदा “थोडी ही और” तथा बीता हुआ काल सदा “कल” ही होता है।

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