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कुगु में तीसरा दिन

मई 23, 2011

कुगु में तीसरा दिन
यात्रा का बीसवाँ दिन 23/6/2010
एक सौ आठ कुंड
सुबह उठे बाहर आए तो देखा आकाश बादलों से घिरा था, हल्की फुहारें पड़ रहीं थीं और हवा गतिमान थी। बाहर बहुत ठंड थी। दैनिकचर्या से निपटकर चाय लेकर कमरे में आकर रजाई में बैठ गए।
आठ बजे पुनः बाहर गए तो फुहारें तो रुक गयीं थीं पर बादल डटे हुए थे। एलओ ने सभी यात्रियों को मानस में स्नान न करने की हिदायत देदी थी।
हम हाथ-मुंह धोकर वस्त्र बदलकर रसोई की ओर मुड़ गए। वहाँ स्मिताबेन, नलिनाबेन,गीताबेन और श्रीमति बैठी हुयी थीं। नाश्ते में उन्होंने उपमा बनाया था। दोपहर के लिए गुजराती खिचड़ी बनाने का कार्यक्रम चल रहा था। मैंने थोड़ा सा उपमा खाया दोबारा चाय पी और कमरे में आकर बैठ गयी। थोड़ी देर तो त्यागी-युगल और स्नेहलता से बातचीत करती रही बाद में सो गयी।
साढ़े दस बजे के आसपास पुनः कमरे से बाहर आकर देखा तो बादल छट गए थे, थोड़ी धूप चमक रही थी। कई यात्री मानस में स्नान करने और जल भरने जा रहे थे,पर हम मन मसोस कर रह गए क्योंकि एक तो हमारी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं थी दूसरे कोई महिला यात्री किनारे तक भी नहीं जा रही थी। हमने जल भर के लाने को मधुप और जुनेजा को अपनी बोतलें देदीं।
लंच में खिचड़ी के साथ-साथ स्मिता और गीता बेन ने अपने साथ गुजरात से लायीं पिन्नी (लड्डू) भी मिष्ठान के रुप में खिलायी। खाना खाते समय ही गुरु ने बताया कि बस में बैठकर एकसौ आठकुंड देखने जाना था। उसका अलग से ग्यारह युआन प्रति सवारी दिया गया था।
हम सब तैयार होकर बस में बैठ गए। प्रकाशवीर, सुरेश और राजेश इत्यादि यात्रियों ने अपने कपड़े भी रख लिए थे स्नान करने हेतु।
बस मानस के किनारे-किनारे जाते हुए बीस/पच्चीस मिनट बाद एक स्थान पर रुक गयी। सभी यात्री नीचे उतर गए। गुरु सभी को इकट्ठा करके मानस के तट पर ही एक सौ आठ कुंड इशारे से बताने लगा। जिस-जिस स्थान पर लामाओं ने तपस्या की थी वही एक सौ आठ कुंड कहे जाते हैं। वहाँ अलग से कुछ नहीं था। किनारे पर दलदल थी और मानस के तट कटे हुए थे। वहाँ मानस थोड़ी अधिक गहरी प्रतीत हो रही थी।
गुरु के साथ कुछ यात्री घूमते रहे, पर हम तो थकान महसूस कर रहे थे सो महिला यात्री तट पर हल्की सी घास पर बैठ गए।
तभी पुनः आकाश में गहरे बादल घिरने लगे। धीरे-धीरे बूंदें पड़ती हुयी तेज बारिश होने लगी। हम सभी यात्री भीगने से बचने के लिए दौड़कर बस में चढ़ गए, पर बादल खेलकर रहे थे, बारिश बंद हो गयी। हम नीचे न उतरे। सभी ने वहाँ कुछ भी दर्शनीय न होने के कारण वापिस गेस्ट-हाऊस जाने की इच्छा जतायी तो गुरु को भी मानना पड़ा।
चूंकि वह स्थान गेस्ट हाऊस से मुश्किल से चार/पाँच किमी था सो एलओ के साथ चैतन्य और अमर इत्यादि उत्साही युवा यात्रियों ने मानस के किनारे-किनारे पैदल जाने का फैसला लिया। हम दो बजे के आसपास बस से वापिस गेस्ट-हाऊस आ गए। सब ने प्रकाशवीर इत्यादि का बहुत मज़ाक बनाया ’होगया स्नान एक सौ आठ कुंडों में?’
कुछ देर आराम किया, फिर लगेज संभाला। शाम को चाय पीकर मोनेस्ट्री चले गए। वहाँ थोड़ी देर ध्यान लगाया, मानस को प्रणाम किया, कुछ चित्राकंन किया और वापिस आकर बिस्तर में लेट गए।
शाम को फिर बारिश हो रही थी। हम अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे हमें वीकनेस लग रही थी। सो न तो खाना खाया और न एलओ की मीटिंग में गए, अपने पास रखा एनर्जी-ड्रिंक पीकर सो गए।

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