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गुंजी से कालापानी

मई 5, 2011

गुंजी से कालापानी
दूरी10 किमीं है।
3570 मीटर है।
13/6/2010 दसवाँ दिन

सुबह की चाय के साथ सबकी आँख खुलीं। जल्दी से तैयार होकर नाश्ता किया। नाश्ते में उपमा बना था और बोर्नविटा था। आज थकान नहीं थी सो सभी ठीक समय पर तैयार हो गए। पोर्टर ने लगेज एक जगह इकट्ठा कर दिया। हम बेंत लेकर बाहर खड़े हो गए। एलओ की सीटी भी बाद में बजी 🙂 मंदिर में शीश झुकाकर और वंदना करके सभी भोले के नाम का जयकारा लगाकर जवानों के साथ चल दिए।
डिप्टी-कमांडर साहब और एलओ ने कल ही बता दिया था कि आगे नोमैन्स एरिया में ट्रैकिंग करनी थी हाई एल्टीट्यूड पर जाना था इसलिए आयटीबीपी के दो डॉक्टर्स और लगभग बीस सिपाही हमारे आगे पीछे और साथ थे। हमें किसी भी हाल में उनसे न आगे निकलना था और न पीछे रहना। कुछ सिपाही सबसे पहले आगे चले गए थे ताकि उनसे आगे कोई भी यात्री न निकल पाए, कुछ बिल्कुल पीछे रहे ताकि उनसे पीछे कोई न रह जाए।
मैं थोड़ी दूर अन्य यात्रियों के साथ पैदल ही गयी। पोनी और पोर्टर मेरे साथ चल रहे थे। कुछ देर में रास्ते में ड्यूटी पर तैनात सिपाही और सारजेंट ने उन सभी यात्रियों को पोनी पर बैठा दिया जिन्होंने पोनी हायर किया हुआ था पर बैठे नहीं थे। उन्हें सभी को साथ चलाने में परेशानी आ रही थी। क्योंकि कुछ लोग बहुत धीरे चल रहे थे जिससे जवानों का आपसी तालमेल बन नहीं पारहा था। वे बार-बार वायरलैस पर आपस में लोकेशन जानते थे और उसके अनुसार ही हाल्ट की घोषणा करते थे।
सबसे आगे चलने वाले यात्रियों को जब कुछ देर के लिए रोक जाता था तो वे सब बैठकर कीर्तन करने लगते थे। वह दृश्य ऐसा लगता था मानों कोई ऋषिकुल कीर्तन कर रहा हो। सभी सच्चे मन से तनमय होकर ताली बजाते और नाचने लग जाते थे।
इस तरह कीर्तन करते, जवानों से बातें करते और प्राकृतिक धरोहर को आँखों में भरते हुए काली नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ते गए। कभी-कभी रास्ता फिसनभरा था तो कभी-कभी बहुत संकीर्ण! बहुत डरने वाले जैसे स्नेहलता जी और वीना मैसूर को जवान हाथ पकड़कर आगे ले जाते थे। हम तो डरते नहीं थे न पोनी पर और न पैदल सो सभी हमें झांसी की रानी कहकर मज़ाक बनाते रहते थे।
रास्ते में दो जगह रुकने पर आयटीबीपी केव जवानों ने यात्रियों को गर्म पानी और चाय-बिस्कुट भी खिलाए। जवानों की सेवा-भावना का अन्दाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वे बार-बार पूंछ कर सभी को चाय सर्व करते थे कोई रह न जाए। कोई मना करता था तो ’थोड़ी सी ले लो’ कहकर आग्रह करते थे।
लगभग पौने ग्यारह बजे हम काली के उदगम स्रोत पर बने कालीमाता के मंदिर पर पहुँच गए। सरोवर के किनारे रास्ते पर चारों ओर रंगीन पेपर की झंडियाँ लगायी हुयीं थीं। छोटे-छोटे पत्थरों को लाल रंगकर उनसे सरोवर के जल में ऊँ लिखा हुआ था।
काली नदी भारत और नेपाल की सीमा रेखा बनकर दोनों को पृथक करती है। कहते हैं कि अप्रैल से अक्टूबर तक काली नदी का जल भारत में आता है तो बाकी समय नेपाल की ओर चला जाता है। मंदिर के पीछे पहाड़ों के शिखरों पर लाल झंडे लगे हुए थे जो हमारी सीमा रेखा के परिचायक थे।
पोनी से उतर गए और काली नदी के जल से बने सरोवर के किनारे-किनारे चलते हुए मंदिर के द्वार पर पहुँच गए।
मंदिर के सामने एक पहाड़ में बहुत ऊँचाई पर एक कंदरा/ गुफ़ा थी, मेरे पोर्टर ने बताया ’यह व्यास गुफ़ा है’ इतने ही एक सिपाही भी सभी को इशारे से दिखाता हुआ व्यास गुफ़ा के बारे में बताने लगा।
ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखरों से घिरे काली मंदिर में भजनों का संगीत बज रहा था। कुछ सिपाही प्रबंधन में जुटे थे तो कुछ अंदर पूजा की व्यवस्था देख रहे थे।
हम सभी ने जूते उतारकर हाथ-मुंह धोकर अंदर प्रवेश किया और लाइन में लगकर दर्शन किए। एक बड़े से कमरे में सामने दो छोटे कक्ष थे जिनमें एक में माँ काली की प्रतिमा विद्यमान थी तो दूसरे में भगवान शंकर जी की। मंदिर को सलीके से सजाया हुआ था। रंगीन कालीन बिछा हुआ था। ढोलक मंजीरे और चिमटा इत्यादि रखे हुए थे जिनसे पता चलता था कि यहाँ भी कीर्तन होता रहता है। देखकर मन मंत्र-मुग्ध हो गया।
बाहर एक अन्य कक्ष में हनुमानजी की प्रतिमा विद्यमान थी।
सभी के दर्शन और अर्चना करते हुए हम आगे बढ़ गए।
लभग पाँच सौ मीटर की ऊंचाई पर कु.मं.वि.नि. का कैंप था। जहाँ जाते ही बुरांस के फूल का शर्बत मिला। एलओने सभी को कमरे बता दिए। हम तीन स्त्रियाँ (नलिनाबेन, सनेहलता और मैं) और तीन गुजराती कपल्स ( नौ लोग) एक कमरे में ठहरे। कमरा वही अर्धवृत्ताकार डोम।
हम हमेशा सुबह नहाकर चलते थे सो आराम से बैठ गए पर जिनको नहाना था वे गर्म पानी के लिए जुट गए।
थोड़ी देर बाद दोपहर का भोजन खाया और कुछ देर के लिए सो गए। शाम की चाय के साथ सब उठे, थोड़ी बातचीत करने के बाद पोर्टर से अपना लगेज खुलवाया और कुछ कपड़े यहीं छोड़ जाने का निर्णय लिया। मैंने, नलिनाबेन और हेमलता त्यागी ने अपना सामान पोलीथिन के बैग्स में करके एक ही बड़े बोरे में बाँध दिया और अपना नाम और अपने बैच का नाम लिखकर यहीं रखने और वापसी में लेने हेतु जमा करा दिया। अन्य यात्रियों ने भी कुछ सामान वापिसी में लेने के लिए जमा करा दिया।
शाम को सभी मंदिर में गए। यहाँ भी गुंजी की भांति जवानों ने भजन सुनाए और भक्ति का ऐसा रस बरसाया कि कब नौ बज गए पता ही न चला। आरती और प्रसाद के बाद सभी वापिस कैंप आगए। एलओ ने कल छः बजे प्रस्थान का समय बताकर अशोक कुमारजी से शिव-वंदना कराने के लिए कहा। सभी ने वंदना की और रात्रि का भोजन करके सुबह उठकर नवींढांग जाने और प्रसिद्ध ’ऊँ’ पर्वत के दर्शन करने के लिए सो गए।

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