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कुगु में दूसरा दिन

मई 22, 2011

22/6/2010 यात्रा का उन्नीसवाँ दिन

मानस के किनारे कुगु में दूसरा दिन

रात को जल्दी सो जाने से सुबह पाँच बजे आँख खुल गयी, पर चुपचाप बिस्तर पर पड़ी रही क्योंकि सहयात्री सोए हुए थे, दरवाज़ा खोलती तो उन सब की आँख खुल जाती। अभी सोच ही रही थी कि किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। मैंने उठकर देखा तो दरवाजे पर एक तिब्बती बुज़ुर्ग हाथ में गर्म पानी का थरमस लिए खड़े थे। मैंने उन्हें अंदर आने दिया वे टेबल पर रखा खाली थरमस उठा ले गए और गर्म पानी से भरा थरमस रख गए। उनके जाते ही मैं भी बाहर निकल गयी।
वे तो अन्य कमरों में पानी रख रहे थे पर मैं अहाते में खड़ी हो गयी। कुछ यात्री जागे हुए थे वे रात को बस में बैठने की चर्चा कर रहे थे। किसी ने कुछ नहीं देखा बस आकाश में रोशनी सी अवश्य दिखायी दी। मैं ठीक रही अपनी नींद खराब न करी। 🙂
अहाते में दूर दायीं ओर टॉयलेट बना था। टॉयलेट था तो गड्ढे के ऊपर ही, पर था साफ़, पानी भी था। मैं दैनिकचर्या से निपटकर रसोई की ओर गयी वहाँ कुक और बिंद्राजी बगैरह चाय बना रहे थे। मैंने मुंह-हाथ धोने के लिए गर्म पानी लिया और बाहर आगयी।
थोड़ी देर बाद सभी यात्री जाग गए और चहल-पहल हो गयी।
गुजराती महिला यात्रियों ने नाश्ते में पकौड़े बनाए। सभी ने उनके सेवा-भाव की हृदय से प्रशंसा की। उस दिन एकदशी थी मेरा व्रत था। मुझे कुछ खाना-पीना नहीं था सो अपने पलंग पर बैठ कर स्नेहलता से बातचीत करती रही।
थोड़ी देर बाद मैंने और स्नेहलता ने मानस के किनारे बैठने की सोची सो हैंड बैग में अपने-अपने कपड़े रखकर मानस-तट की ओर चले गए।
वहाँ नलिना, स्मिता और गीताबेन पहले से ही पहुँची हुयी थीं। वे तीनों मानस के तट पर बिखरे गोलाकार पत्थरों में ’ऊँ’ लिखे पत्थर ढूंढ रही थी। हम दोनों भी उनके साथ-साथ घूमते बातचीत करते काफ़ी आगे निकल गए। जब थक गए तो वापिस होने लगे।
वे तीनों तो गेस्ट हाऊस की ओर चली गयीं, हम वही धूप में पत्थरों पर बैठकर मानस के रुप को निहारते रहे। सूर्य की किरणें और मानस की लहरें क्रीड़ा करते हुए सुंदर दृश्यावलि भेंट कर रहीं थीं। हम उन्हें देखने में खो गए।
थोड़ी दूरी पर ही एक विदेशी सैलानी लड़की चटाई पर बैठी हुयी थी, नेपाली टूर-हेल्पर उसके लिए टेंट लगा रहे थे। स्नेहलता उसके पास गयीं और परिचय लिया-दिया तो पता चला वह यूके से आयी थी। मांधाता और गुरिल्ला पर्वतों पर चढ़ाई करके कुछ घंटे मानस के तट पर बैठकर शाम को चले जाना था।
जब धूप में कुछ तेजी अगयी तो मैंने स्नेहलता से मानस-स्नान के लिए कहा। हमने देखा कि उस दिन सहयात्री स्नान करने नहीं गए थे। इक्का-दुक्का सहयात्री दूर आगे जा रहे थे, हमारे कुक मानस-तट से दूर हटकर अपने कपड़े धो रहे थे, पर हमने वहीं थोड़ा अंदर जल में जाकर डूबकी लगायी और बाहर आगए।
कुछ देर और मानस पर बैठकर पूजा-ध्यान करके हम वापिस गेस्ट-हाऊस आगए। हमने देखा कि कुछ सहयात्री मोनेस्ट्री की ओर वाले दरवाज़े से जाकर कपड़े धो रहे थे, हम भी अपने पुराने पहने हुए वस्त्र और वाशिंग-पाऊडर लेकर उधर ही चले गए।
गीता-बेन और स्मिताबेन भी अपने कपड़े लेकर आ गयीं। वहाँ पीछे पहाड़ों से जल बहकर आरहा था जिसे एक गड्ढा करके आगे जाने से रोक दिया गया था उसी जलधारा पर टूटा हुआ डिब्बा लगाकर पानी का निकास सही कर रखा था , बाल्टी और लोहे का तमिया भी पड़ा था। हम सभी ने वही अपने कपड़े धो डाले और मोनेस्ट्री के आगे बने गोम्फ़ा के चबूतरे पर सुखा दिए। स्वयं हवन वाले चबूतरे पर बैठकर कैलाश-मानसरोवर को देखते रहे। हवा और धूप बहुत तेज होने कारण कपड़े जल्दी सूख गए।
लंच तैयार होने वाला था सो सभी अहाते में बैठे बातचीत कर रहे थे। उस दिन सुबह से एलओ किसी ने नहीं देखे थे सो सभी उनके बारे में पूछ अरहे थे कुछ मज़ाक कर रहे थे कि उनपर फ़ाइन होगा वह अपने बडी को बिनाबताए गए थे।
अभी सब बात कर ही रहे थे कि सामने से एलओ और चंदन आते दिखायी दे गए। उन्होने बताया कि वे सुबह एक दो लोगों को बताकर सामने मांधाता पर्वत पर चढ़कर वहाँ से कैलाश-मानसरोवर के मनोरम दृश्य देखने गए थे। सभी ने लंच किया। हम गेस्ट हाऊस आकर अपने कमरे में सो गए।
तीन बजे अशोककुमार जी ने कमरे में आकर बताया कि मंगलवार होने के कारण उनके कमरे में सुंदरकांड का पाठ किया जाना था। हम उठकर हाथ-मुंह धोकर वहाँ चले गए। काफ़ी सारे सहयात्री वहाँ
बैठे हुए थे। सभी ने मिलकर पाठ किया और भजन गाए।
पाठ के बाद हम अपने कमरे में आगए। कमरे में ही शाम की चाय आगयी हमने अपने पास रखे ड्राईफूट के साथ चाय पी। यूं हमसे बिंद्राजी ने व्रत के लिए आलू उबलवाने के लिए पूछा था पर हमने मना कर दिया था। हम थकान सी महसूस कर रहे थे सो पुनः मुंह ढ़ककर सो गए।
शाम को सभी लोग बाहर घूम रहे थे पर हम बिस्तर से न उठे। तबियत फ़िर खराब सी होने लगी थी। हम लेटे रहे। रात को एलओ की मीटिंग में भी न गए। हमारे ग्रुप-लीडर हमें बुलाने आए पर हमारी हिम्मत न हुई, हम सोना चाहते थे सो सो गए।

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