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एक दिन और तकलाकोट में

मई 28, 2011

26/6/2010 तेइसवाँ दिन

सुबह साढ़े छः बजे उठे, उठकर स्नान-ध्यान किया और आठ बजे डाइंनिंग-रूम में जाकर चाय नाश्ता किया। वहीं एलओ ने बताया कि पास में ही दस/ग्यारह किमी की दूरी पर पहाड़ों के बीच पार्वती-मठ देखने जाने का प्रोग्राम था।
हमने गुरु ने उस मठ के बारे में पूछा तो पता चला कि पार्वती तिब्बत की एक बौद्ध-भिक्षुणी थीं जिन्होंने उस स्थान पर तपस्या की थी जहाँ उनका मठ था।
मैंने और स्नेहलता ने वहाँ जाने से मनाकर दिया, पता चला कि और भी कई यात्री नहीं गए थे। हम कुछ देर अपने कमरे में ही बातचीत करते रहे और लगेज बाँध दिया। उसके बाद बाहर आकर घर फोन किया और धूप में बैठ गए। एक घंटे में सभी यात्री वापिस आगए। हमने मठ के बारे में पूछा तो सभी ने कहा अच्छा हुआ नहीं गयीं, वहाँ कुछ खास नहीं था।
आसपास में ही अलकापुरी भी थी जहाँ भगवान शिव ने भस्मासुर को भस्म किया था , कहते हैं वहाँ अब भी भस्म फैली हुयी है; पर चीन-सरकार ने उस स्थान को तीर्थयात्रियों के टूर में शामिल नहीं किया था सो वहाँ न जा सके।
दो बजे दोपहर के भोजन के पश्चात सभी यात्री तकलाकोट के बाज़ार में घूमने निकल गए। एक सिरे से दूसरे सिरे तक पूरा बाज़ार छान मारा। सभी अपने घर-बाहर के लोगों के लिए कुछ न कुछ खरीद रहे थे। हमने दो स्वेटर दो स्कार्फ़,एक छतरी और कुछ फल वहीं खाने के लिए खरीदे। फल बहुत मंहगे थे, सत्रह रुपए का एक केला और बाइस की एक नाशपाती। हम घूमते फिरते शाम को चार बजे वापिस गेस्ट-हाऊस आ गए।
शनिवार होने के कारण अशोक कुमार, के.के.सिंह और मधुप सुंदरकांड का पाठकर रहे थे। हम और स्नेहलता भी पाठ में जाकर बैठ गए। बाज़ार घूमने जाने के कारण बहुत कम लोग थे पाठ में।
पाठ समाप्ति पर चाय पी तो वहीं पता चला एलओ जल्दी मीटिंग ले रहे थे। धीरे-धीरे करके सभी सभा-कक्ष में पहुँच गए। सबसे पहले शिव-वंदना हुयी तत्पश्चात कल हुयी सहमति के अनुसार एलओ ने चीनी गाइड्स के अच्छे कार्य-संयोजन हेतु एक प्रशंसा-पत्र टाइप करवाया था जिस पर सभी ने हस्ताक्षर किए और मैखिक रुप से भी गुरु, डिक्की और तीसरी गाइड की भूरि-भूरि प्रशंसा की। वैसे तीनों गाइड्स का बर्ताव सचमुच प्रशंसनीय था।
वयोवृद्ध सहयात्री श्रीबंसलजी के हाथों से तीनों को सौ-सौ युआन इनाम दिलवाए। तीनों कुकस और दोनों किचेन वाली महिलाओं और सफ़ाई-कर्मचारी को भी भेंट दीं गयी।
गुरु ने सभी यात्रियों को चीन-सरकार की ओर से दिया गया कैलाश-पर्वत की यात्रा का प्रमाण-पत्र भेंट किया।
एलओ ने सभी से लगेज पैक करके रात को ही रिसेपशन पर रख देने को कहा। राशन-कमेटी से जो भोज्यसामग्री बच गयी थी उसे गुरु की मदद से गेस्टहाऊस के एक कमरे में रखवाने को कहा ताकि अगले दिन पहुँचने वाला ग्रुप चाहे तो उसका उपयोग कर सके। अगले दिन अपने देश की सीमा में प्रवेश हेतु सुबह चार बजे निकलना था सो चाय न मिलने की बात सामने आयी क्योंकि गुरु ने इतनी सुबह चाय का प्रबंध करवाने में असमर्थता ज़ाहिर की थी। के.के.सिंह ने जो स्वयं चाय नहीं पीते थे ने सुब तीन बजे सभी को चाय बनाकर पिलाने की ज़िम्मेदारी लेली। सभी ने तालियाँ बजाकर उनके सेवाभाव की सराहना की।
उस रात डिनर चीनी महिलाओं ने नहीं बल्कि सहयात्री के.के.सिंह, मधुप, प्रकाशवीर इत्यादि ने बनाया था। कचौड़ी, सीताफल की सब्जी और तीन प्रकार की चटनियाँ तथा खीर। स्वादिष्ट बनाने के साथ-साथ खिलाया भी बड़े ही मन से । सभी उनके मुरीद हो गए थे।
जल्दी से खाना खाकर हम बिस्तर पर पहुँच गए, पर अपने देश जाने की खुशी में नींद ही न आरही थी। बहुत देर तक तीनों बातें करते रहे फिर न जाने कब आँख लग गयी पता भी न चला।

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