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नवींढांग से तकलाकोट(तिब्बत)

मई 8, 2011

15जून 2010(बारहवाँ दिन)
(नवींढांग ऊँचाई 4145 मीटर, लिपुलेखपास ऊँचाई 5334 मीटर,
नवींढांग से लिपुलेख की दूरी ( तिब्बत-सीमा तक) 8.5 किमी

इस दिन की यात्रा के दो चरण थे।
प्रथम- नवींढांग से लिपुलेख दर्रा पारकर तिब्बत की सीमा में प्रवेश. दूरी 8.5 किमी
दूसरा- तिब्बत सीमा से तकलाकोट(शहर) तक की यात्रा। ”
लिपुलेख पास पार करके चीन की सीमा में”दूरी 19 किमी

प्रथम चरण
सुबह डेढ़ बजे चाय आ गयी। ठंड इतनी कि रजाई में से मुंह निकालने का जी न था, पर आज की यात्रा प्रकृति के अकुंश से चलने वाली थी सो सभी यात्रियों ने एकदम बिस्तर छोड़ दिया। दैनिकचर्या के साथ तैयार होने लगे। कु.मं. के कर्मचारियों की कर्तव्यपरायणता का तो जबाव ही न था उन्होंने यात्रियों के उठने से पहले ही गर्म पानी कर दिया था। सभी ने गर्म पानी से हाथ-मुंह धोए। सब मेरा मज़ाक बना रहे थे – ’आज क्यों नहीं नहाओगी?’
इनर से लेकर विंड-चीटर तक पाँच लेअर्स में कपड़े, हाथ-पैरों में डबल गल्व्ज़ और जुराबें, सिर पर मंकी कैप और स्कार्फ़ बाँध लिया (जैसे कि हमेशा डॉक्टर्स ने सुझाया था) सब वेश बदलकर डाकू से लग रहे थे। 🙂
नाश्ते के लिए कु.मं. के रसोईये ने आलू-पूरी पैक करके साथ दे दिए थे। सभी यात्री बोर्नविटा पीकर हाथ में बेंत लेकर सीटी का इंतज़ार करने लगे। आईटीबीपी के जवान जल्दी मचा रहे थे चलने के लिए। एलओ ने ग्रुप-लीडर्स की ओर देखा तो सभी ने हाँ में गर्दन हिला दी। एलओ ने स्वास्थ्य संबंधी हिदायतें देकर और सावधानी से चलने की सलाह देते हुए अशोककुमार जी से भोले-शंकर के जयकारे लगवाए और सभी बड़े जोश में लगभग ढ़ाई बजे चल पड़े।
थोड़ी दूरा पर ही पोनीवाले खड़े थे जिन्होंने यात्रियों को बिठाना शुरु कर दिया। पैदल चलने वाले यात्री सिपाहियों के साथ आगे बढ गए कुछ जवान पीछे थे। हम पोनी पर बैठकर चल पड़े। सघन ठंड में संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा था। यूँ तो आसमान साफ़ था, तारे चमक रहे थे पर अंधेरा था, पोर्टर और पैदल यात्री टॉर्च जलाकर हाथ में लेकर चल रहे थे। बस ऊंचे खड़े पहाड़ों की आकृति ही समझ आ रहीं थीं।
अंधेरे में माइनस टेम्प्रेचर में साथ उड़ा ले जाने वाले हवा के झोंकों के बीच जूतों और बेंतों की टक-टक, नाक की सूं-सूं सुनसान दर्रे को गुंजित कर रही थी दूर ऊँचाई पर टॉर्च की रोशनी ऊपर-नीचे चलने के कारण हिलाते हुए आगे बढ़ते तीर्थ-यात्री मानों पैदल स्वर्ग जा रहे हो। 🙂 बीच-बीच में पोनी वालों की पोनी को कंट्रोल करने हेतु निकालने वाली हिच-हिच की आवाज भी एकरसता को तोड़ रही थी।
उस दिन पचासों सिपाही और दो डॉक्टर्स मैडिकल-इक्यूपमेंट्स, ऑक्सीज़न-सिलेंडर्स और दो पोर्टेबल- स्ट्रेचर के साथ यात्रियों के बिलकुल साथ-साथ चल रहे थे। किसी को कोई परेशानी न हो हर पल का ध्यान रख रहे थे। बार-बार हाल पूंछते हौंसला बढ़ाते और पोनी वालों को हिदायतें देते आगे ले जा रहे थे।
चलते-चलते कुछ दूरी पर एक टूटे से चबूतरे के पास पोनी वाले ने हमें उतार दिया। पता चला काफ़िले को रोक दिया गया था। कुछ सिपाही और यात्री काफ़ी पीछे रह गए थे। उनके आने का इंतज़ार करना था। मैंने चबूतरे के पीछे की ओर टॉर्च से देखा तो वहाँ बर्फ़ की शिलाएं पड़ी थीं। वह कोई छोटी सी बिल्डिंग का खंडहर था। मेरे पूछने पर एक सिपाही ने बताया कि वह आईटीबीपी का मीटिंग-हॉल था। बहुत ज़्यादा बर्फ़ पड़ने से उसकी छत टूट गयी थी। बिल्कुल सामने पहाड़ गिरने से चट्टानें बिखरी पड़ीं थीं।
कुछ देर में पीछे से आते यात्री और सिपाही नज़र आए तो सारजेंट ने हम सभी को आगे बढ़ने की कमांड दे दी। ठंड के कारण मुंह में से तेज आवाज़ तो न निकल रही थी पर मन ही मन भोलेशंकर की जय करते हुए आगे बढ़ते रहे।
पहाड़ों पर जल्दी दिन निकल आता है सो पौने पाँच बजे के आसपास पौ फटनी शुरु हो गयी। धीरे-धीरे धुंधलका कम होने लगा। बर्फीले पहाड़, झरना, घाटी सभी मानों श-श-श चुप रहने की हिदायत दे रहे हो।
थोड़ा आगे चले तो नदी/जल-धाराएं पार करनी पड़ीं। हम तो पोनी पर थे पर जो लोग पैदल थे उन्हें सिपाहियों ने पकड़-पकड़कर बड़ी सावधानी से निकाला। मेरे सामने ही एक सिपाही एक यात्री के साथ जाता हुआ स्वयं पानी में गिर गया। उसके सारे कपड़े गीले हो गए थे। इतनी ठंड में उसने कैसे मैनेज किया होगा!
दूर बर्फ़ से ढ़की चोटियों पर चलता जवान मानों रेंग रहा हो। पौने सात बजे के आसपास डिप्टी कमांडर हम सब को वहीं रोककर स्वयं पहाड़ी पर चढ़कर देखने गए कि चीनी अधिकारी पहुँचे कि नहीं। हवा के तेज झोंकों से बचाने हेतु हमें वहाँ छोड़ गए थे। हम उनके सेवा-भाव और सहृदयता को नमन करते हैं।
और आगे बढ़े तो दिन निकल आया। दिनकर ने अंगड़ाई ली और पहाड़ों की चोटियों पर अपनी सुनहरी रश्मियाँ फैला दीं वाह क्या दृश्य था! ठंड-वंड सब भूल गए। खो गए उन बर्फ़ के कुओं को देखने में और चारों ओर बिछी सफ़ेद जाजम पर सुनहरे वितान के सौंदर्य में…
चारों ओर चमकीले हिम-मंडित पहाड़ और घाटी बस और कुछ नहीं। आठ-आठ फुट तक बर्फ़ जमी थी। आईटीबीपी के जवान हमारे सामने भी बर्फ़ काटने वाली कुदाल से रास्ता बना रहे थे। पोनी फिसल रहे थे। ’जय भोले की’ करते सब बढ़ते जा रहे थे। कभी पोनी का पैर तो कभी पैदल चलने वालों का पैर दो-दो फुट तक बर्फ़ में धंस जाता था। जब पोनी का बर्फ़ पर चलना बिलकुल मुश्किल हो गया तो पोनीवाले ने हमें उतार दिया। हम पैदल ही पोर्टर के साथ बर्फ़ पर गिरते-पड़ते चलने लगे।
डिप्टी कमांडर ने अपने सिपाहियों से यात्रियों को ऊपर लाने को कहा। हम सब पुनः आगे बढ़ते हुए बिल्कुल सीमा पर पहुँच गए। सीमा पर जवानों का जमावड़ा था। हमारी ओर हमारे सशस्त्र जवान जमे थे तो सामने तीन मीटर के फासले पर ही चीनी अधिकारी, मिलट्री-मैन और हमारा लगेज उठाने के लिए तिब्बती पोर्टर खड़े थे। पहाड़ियों पर लगे झंडे सीमा बन रहे थे, वरना पता भी नहीं चल रह था कि कौन सी हद से कौन सा देश शुरु होता है। सब एक सा …मनुष्य सीमा बनाता है पहाड़ और धरती नहीं।
हम वही पत्थर की शिलाओं पर बड़ी मुश्किल से संतुलन बनाकर बैठ गए। हवा उडा ले जाना चाहती थी, हल्की बारिश और बर्फ़ भी पड़ने लगी थी। पैदल यात्री हाँफ़ते हुए धीरे-धीरे पहुँच रहे थे। सिपाही और एलओ उनका हौंसला बढ़ाते हुए अपने साथ लाने के कारण नहीं पहुँचे थे। उनके बिना सीमा में प्रवेश की कार्यवाही शुरु नहीं हो सकती थी। हम सभी यात्री अपनी पोकेट से चॉकलेट और ड्राईफ्रूट्स निकालकर खाने लगे। इतनी ठंड में भी गला बिलकुल सूख रहा था। पानी की बॉटल तो साथ थी पर पिया नहीं क्योंकि लघुशंका के लिए कुछ नहीं था।
कुछ ही पलों में एलओ साहब पहुँच गए। आते ही सारजेंट ने उन्हें आगे करके चीनी अधिकारी से अधिकारिक तौर पर मिलवाया और एक-एक करके यात्रियों को पासपोर्ट हाथ में लेकर तिब्बत सीमा में प्रवेश करने का इशारा कर दिया।
वहाँ बड़ा अफ़रा-तफ़री का दृश्य था। सभी सिपाही,अधिकारी, पोनी वाले और पोर्टर बिल्कुल सीमा पर खड़े थे। अगर कोई ज़रा भी हिला देता तो चीन -अधिकृत तिब्बत में पहुँच जाते 🙂 पुलिसवाले बार-बार आगाह कर रहे थे अपने जवानों को और अन्य कर्मचारियों को भी।
चीनी अधिकारी अपनी लिस्ट से एक एक का नाम बोलकर बुला रहे थे। यात्री पीछे थे उनका नाम आगे था सो वह वहाँ तक पहुँचने में देर लगाते थे तबतक चीनी अधिकारी दूसरा नाम पुकार देता:-) थोड़ी देर बाद उसने अपने आप आकर अपना नाम और पासपोर्ट के साथ चेहरा दिखाकर प्रवेश करने की अनुमति दे दी।
तिब्बत की सीमा रेखा के अंदर जाने तक आईटीबीपी के जवान हमारे साथ थे। जब तक हम सब तिब्बत की सीमा में प्रवेश किए वे सब वहीं खड़े किसी न किसी रुप में हम सब की मदद करते रहे। हमें भी उनसे विदा लेना द्रवित कर रहा था। हम सब उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए यात्रा पूरी करके पुनः मिलने की इच्छा लिए आगे बढ गए। वे भी भावभिवोर होकर हाथ हिलाते हुए विदा कर रहे थे …
अगले अंक में लिपु से तकलाकोट तक का सफ़र …

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