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यमद्वार से डेरापुख

मई 16, 2011

… 18-जून-2010( पँद्रहवां दिन)
(द्वितीय चरण)
यमद्वार से डेरापुख
दूरी लगभग दस किमी
डेरापुख ऊँचाई 4909 मीटर

लगभग आधे घंटे बाद बस रुक गयी और हम सब एक नदी के किनारे के विस्तृत क्षेत्र में खड़े थे जहाँ बहुत सारे पोनी थे और तिब्बती पोर्टर।
गुरु ने पोनी लेने वाले तीर्थयात्रियों की एक लाइन और पोर्टर लेने वालों की दूसरी लाइन लगवा दी, जिनको दोनों लेने थे उन्होंने अपने बैग पोर्टर वाली लाइन में रख दिए। 🙂
गुरु ने ठेकेदार को बुलाया तो उसने अपनी भाषा में कुछ आनाकानी की। गुरु, डिक्की और ठेकेदार बड़ी देर तक बातचीत करते रहे। जब एलओ ने जल्दी करने के लिए कहा तो गुरु ने ठेकेदार से अपनी बातचीत समाप्त करके बताया कि पोर्टर्स पहुँचने वाले थे।
कुछ ही मिनटों में डिक्की ने गुरु को प्रक्रिया शुरु करने को कहा तो गुरु ने ठेकेदार से नामों की पर्ची ले लीं और अपनी उल्टी टोपी में रखकर नंबर से हरेक यात्री से एक-एक पर्ची उठाने को कहा जिस पर्ची पर जो नाम लिखा था वही उसका पोर्टर था। अधिकांश लड़कियाँ थी पोर्टर के रुप में।
मैंने जब एक पर्ची निकाली और डिक्की ने नाम पुकारा तो एक छोटी सी लड़की तिब्बती वेशभूषा में आँखों को छोड़कर सिर और चेहरे को पूरी तरह स्कार्फ़ से ढ़के हुए भागकर आयी और मेरा बैग और बेंत थाम कर मुझसे चलने का इशारा करने लगी। मैंने उसे ठहरने का इशारा किया और पोनी की लाइन में खड़ी रही।
जिन यात्रियों ने केवल पोर्टर ही हायर किया था वे उनके साथ परिक्रमा पर चले गए, पर जिनको पोनी भी चाहिए था वे अभी भी अटके हुए थे। एलओ गुरु और सहयात्री के.के.सिंह को जिम्मेवारी सौंपकर पैदल यात्री जुनेजा, प्रकाशवीर और सुरेश इत्यादि के साथ चले गए।
पोनीवाले शायद ज़्यादा आगए थे सो छीना-झपटी सी होने लगी पर गुरु ने शांति से पर्ची उठवायीं और पोनी दिलवा दिए।
मुझे पोनीवाली भी लड़की ही मिली। मैंने गुरु से जानना चाहा कि पोनी वाली लड़की पोनी पर नियंत्रण कर लेती थी कि नहीं? गुरु ने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा ’वह अपना काम बिलकुल ठीक करती है कोई परेशानी नहीं होगी।”
दोनों लड़कियों को हिंदी या अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी पर इशारे से अपनी बात समझा देती थीं।
पोनीवाली मुझे अपने पोनी के पास ले आयी। उसने स्वयं पोनी की लगाम पकड़ी और दूसरे पोनी वाले लड़के ने जीन कसकर पकड़ी तब मैं पोनी पर चढ़ पायी। लगभग पौने दस बजे हम परिक्रमा के लिए चल पड़े।
पोर्टर बैग हाथ में लिए मटकती आगे-आगे दौड़ गयी। पोनीवाली लगाम मुझे पकड़ाकर स्वयं पीछे से पोनी को हांकते हुए चलती रही।
चट्टानों के टूटने से बनी रोड़ी से भरे रास्ते पर नदी के साथ-साथ पोनी धीरे-धीरे चल रहा था। वह बार-बार उसे हांकती और तेज चलाने का प्रयास करती आगे बढा रही थी।
मैं प्रकृति के अद्भुत दृश्यों में खो गयी थी। आकाश गहरा नीला था, सूर्यदेव अपनी ऊष्मा उड़ेल रहे थे और वायु वेगवान थी। पर तापमान शून्य के आसपास होगा क्योंकि नदी का जल जमा हुआ सा था और पठारों के बीच से निकलते झरने जमे होने के कारण बीच में ही अटक रहे थे। तेज धूप भी उन्हें पिघला न सकी थी।
दायीं ओर कैलाश-पर्वत अपनी श्वेत आभामय छवि के साथ दिव्य-दर्शन दे रहे थे, साथ में नंदी पर्वत उनके सौंदर्य की वृद्धि कर रहा था।
बीच-बीच में हमें सामने से आते बौद्ध-अनुयायी परिक्रमा लगाते दिखायी दिए। वे हमसे विपरीत दिशामें चलकर परिक्रमा करते हैं। कुछ तो लेट-लेटकर परिक्रमा मार्ग पर जा रहे थे। हमसे शुरु में ही इनको रास्ता देने और फोटो न लेने की हिदायत दी गयी थी सो हम उनके निकलने तक रुक जाते थे।
आधे घंटे बाद लड़की ने पोनी को रोककर मुझे उतार दिया। मैं एक टीले पर बैठ गयी। वे दोनों वहीं एक टैंट में बनी दुकान में कुछ खाने-पीने चली गयीं। वहाँ सारे पोनीवाले-और पोर्टर्स जा रहे थे।
दोनों शीघ्र ही आगयीं और हम फि आगे बढ़ने लगे।
रास्ता बहुत उतार-चढाव का न था सो हम तेजी से आगे बढ़ गए। बारह बजे के आसपास दोनों लड़कियों ने मुझे पोनी से उतार दिया और एक जल धारा के पार सामने की ओर इशारा करके बताया कि वहाँ पहुँचना था। मैं बिलकुल अकेली थी दूरतक कोई सहयात्री आता दिखायी न दिया सो उनके साथ वहीं बीच में बैठ गयी। तभी सहयात्री श्री अहीरे दिखायी दिए, मैंने उनसे रास्ता पूछा और अन्य यात्रियों के बारे में जानना चाहा तो वह भी ठिठक गए और वहीं कुछ दूर पर बैठ गए।
दोनों लड़कियाँ जल्दी मचा रहीं थीं। मैं उनके फोटो लेने लगी तो वे दोनों रुक गयीं। तभी हमने देखा कि अन्य यात्री जलधारा के दूसरे किनारे से सामने जा रहे थे।
हम पोर्टर के साथ तेजी से वहाँ पहुँच गए। वही डेरापुख विश्राम-स्थल था। गुरु और डिक्की तो पहुँच गए थे पर एलओ अभी नहीं पहुँचे थे सो कमरे अभी बंद थे।
हमने डिक्की से टॉयलेट पूछा तो उसने सामने इशारा कर दिया। सामने पाँच फुट ऊँची मिट्टी से पुती एल आकार की बिना दरवाज़े की दीवार की ओट में तीन मीटर गहरे गड़्ढ़ों के ऊपर दो छिद्र कर रखे थे। उनमें नीचे और ऊपर हर जगह मल सड़ रहा था, शायद उनमें बहुत दिनों से सफ़ाई नहीं हुयी थी। मैं नाक बंद करके बाहर आ गयी और कमरों के पीछे दूर जाकर निपटकर आयी। जब गाइड से सफ़ाई के बारे में कहा तो उसने बताया कि पोनीवाले और पोर्टर्स चुपके से गंदा कर जाते हैं|
एलओ ने आते ही कमरे और सहयात्री बता दिए। हमारे ग्रुप के समस्त छःयात्री एक ही कमरे में ठहरने थे पर अभी तक कोई पहुँचा नहीं था।
कमरे में छः पलंग पर बिस्तर लगे थे पर उनमें सीलन की दुर्गंध आ रही थी, मैंने अपनी रजाई और गद्दा कमरे के बिलकुल सामने धूप में सुखा दिए मुझे देखकर अन्य यात्रियों ने भी वैसा ही किया।
धीरे-धीरे यात्री पहुँच रहे थे और बाहर ही खड़े ही थे कि जुनेजा और एलओ ने बताया कि चरण-स्पर्श दर्शन पर जाने वाले यात्री एक स्थान पर एकत्र हो जाएं। हमारे ग्रुप से वीना मैसूर को छोड़कर सभी जाना चाहते थे पर एलओ ने स्नेहलता को रोक दिया क्योंकि उनकी अष्टपद पर जाते समय तबियत खराब हो गयी थी। वह थोड़ी उदास होकर कमरे में चली गयीं।
मैंने जुनेजा से चरण-स्पर्श के बारे में पूछा तो उसने बताया कि आधा घंटा लगता है पहुँचने में, और आगे बढ़ गया।

अगले अंक में अलौकिक अनुभूति…

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