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गर्ब्यांग से गुंजी

मई 1, 2011

गर्ब्यांग से गुंजी तक
वाया सीती गांव 11/6/2010 आठवाँ दिन

पर जल्दी ही हवा में ठंडक महसूस होने लगी मैंने पुनः स्वेटर लाद लिया और आगे बढ़ती रही। बीच-बीच में सहयात्री मिलते रहे। आदि कैलाश के दर्शन करके आने वाले यात्री भी मिल रहे थे जो ‘ऊं नमः शिवाय’ कहकर तीर्थयात्रा संपूर्ण होने की शुभकामनाएँ भी देते जा रहे थे।
हम नदी के किनारे-किनारे चले जा रहे थे। प्रकृति अपना सौंदर्य संभाल न पा रही थी, बिखरा जा रहा था, यात्री आँखों और कैमरों में भरते चले जा रहे थे। सुबह से अबतक चलते-चलते दोपहर हो गयी। लगभग एक बजे पोनी वाले ने मुझसे उतरने के लिए कहा। मैंने पोर्टर से जगह के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यह सीती गांव है यहाँ दोपहर का खाना मिलेगा।

मैं पोनी से उतरकर थोड़ा आगे बढ़ गयी। चौड़े खुले मैदान जैसे क्षेत्र में बिलकुल सामने काली नदी बह रही थी दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ खड़े थे। पहाड़ वाली साइड में हरी घास के मैदान में पोनियों का झुंड भोग (घास चर) लगा रहा था। एक ओर छ्प्पर वाले दो कमरे से थे। एक में ढाबे की तरह भिगोने सजे थे थे जिनमें दाल-राजमा, चावल, राई की सब्जी और रोटी थीं। दूसरे में चाय और मट्ठी इत्यादि थे।
आगे कुछ प्लास्टिक की कुर्सियाँ पड़ीं थी। थोड़ा और आगे पेड़ के सूखे मोटे-मोटे दो तने पड़े थे, जिनपर कुछ सिपाही बैठे हुए थे। उनके सामने हमारे एलओ साहब धूप में कुर्सी पर बैठे खाना खाते-खाते बीच-बीच में उनसे बातें भी करते जा रहे थे। मुझे देखते ही सिपाहियों ने अभिवादन किया और कुर्सी लेने के लिए कहा।
मैं बैठने की बजाय झोंपड़ी के पीछे की ओर चली गयी। जहाँ पोनी के बांधने की जगह थी। उनके मल-मूत्र की इतनी दुर्गंध आ रही थी कि खड़ा न हुआ जाए, पर मुझे तो अपनी लघुशंका दूर करनी थी सो मुंह पर स्टॉल लपेट कर थोड़ा और आगे गयी जहाँ मिट्टी का बिलकुल गारा हो रहा था। मैं वहीं बैठकर आगयी।
हाथ धोकर मैंने खाने के लिए थाली उठाई और खाना लेने पहुँची, तो वहाँ खड़े एक आदमी ने जिसे शायद पहाड़ी भाषा ही आती थी, ने खाना परोस दिया। मैं खाना लेकर बैठी ही थी कि कई सहयात्री आगए- चैतन्य, अमर, नीलोय, श्रीमती एवं उसके पति इत्यादि। भीड़ सी हो गयी। सब मस्ती करते हुए कुर्सी और लक्कड़ पर बैठ गए। श्रीमति और दूसरी अन्य महिला तीर्थयात्रियों को भी मेरी तरह पीछे ही जाना पड़ा। एलओ सभी यात्रियों से खाना खाकर जल्दी पहुँचने की कहकर आगे चल गए।
मैं खाना खाकर अन्य यात्रियों से बातें करते हुए अपने पोनी और पोर्टर का इंतज़ार करने लगी। पोनी वाले ने बताया “पोनी अभी चर रहा है, थोड़ी देर में चलेंगे।” मैं पुनः बैठ गयी। थोड़ी देर में उसने मुझे चलने के लिए बुलाया , मैं खड़ी हो गयी। वह पोनी पास में ले आया। मैं लक्कड़ के एक तरफ़ खड़े होकर जैसे ही पोनी पर चढ़ना चाहती थी लकड़ के दूसरे सिरे पर बैठे जवान मेरी मदद के लिए उठ गए बस बैलैंस बिगड़ गया और मैं गिरने की मुद्रा में आ गयी पर गिरी नहीं संभल गयी 🙂 सभी भागे। जवानों ने अपना खेद प्रकट किया। मैं उनसे ” परेशान न हों” ऐसा कहकर पुनः पोनी पर चढ़कर चल पड़ी।
मैं, पोनीवाला और पोर्टर बातें करते काली नदी के किनारे आगे बढ़ते जा रहे थे। मैं उनसे कुछ-कुछ पूछती रहती थी। नदी के उस पार नेपाल था। मैं नेपाल के गांव के दृश्य देखती आगे बढ़ रही थी। मेरा पोर्टर थक चुका था सो वह बार-बार पीछे रह जाता था। मैंने उससे पानी की बॉटल लेकर पोनी वाले को दे दी और उससे आराम से आने की कहकर आगे बढ़ गयी।
थोड़ी दूर चलने पर सामने आदि कैलाश के दर्शन हो रहे थे।
आदि कैलाश भारत में ही है। यहाँ भी लोग दर्शन हेतु और प्रकृति को निहारने जाते हैं। मैं पोनी पर बैठे हुए ही फोटो लेते-लेते आगे बढ़ती रही। रास्ता प्लेन पर पथरीला था। नदी उल्टी दिशा में बहती हुई साथ दे रही थी।

कुछ देर बाद दो नदियों का संगम आया। पोनीवाले ने बताया कि यह काली और गोरी गंगा का संगम है, एक कालापानी से आरही है तो दूसरी नेपाल की ओर जा रही है। दोनों का पानी मिलते समय भी अलग रंग दिखाता हुआ मिलता है।
अब सामने नदी के पार से गुंजीकैंप दिखायी देने लगा था। नदी पर पुल बना था जिसे पार करने से पहले एक बार फिर भ.ति.सी.पु.ब. के जावानों ने रोककर चाय पिलानी चाही, पर मैं अब कैंप पहुँचना चाहती थी सो हाथ जोड़कर उनसे क्षमा मांगते हुए पोनी पर ही बैठी रही,।जवान से कहकर मैंने अपने पोनीवाले को चाय पिलवा दी। इतने मैंने ही पोनी को संभाले रखा। बहुत सीधा था वह जानवर, चुपचाप खड़ा रहा, पोनीवाला सामने खड़ा चाय पी रहा था।
चाय पीकर वह पोनी को ले जा रहा था। पोनी तेज चल रहा था, क्योंकि रास्ता प्लेन था। हमने पुल से नदी पार की और खादर में बिल्कुल नदी के किनारे चलते हुए आगे बढ़ रहे थे।। कभी-कभी कोई जवान या ग्रामीण नदी के किनारे से जाता हुआ दिखायी दे जाता था।
थोड़ी देर बाद नदी के बिल्कुल किनारे होने के कारण रास्ते में रेत बहुत बढ़ गयी थी। पोनी के पैर उसमें गढ़ने लगे और छोटी-छोटी पत्थर की कंकड़ियाँ उसके पैर में चुभने लगी जैसा कि वह लड़का बता रहा था तो वह असंतुलित होने लगा और आवाज निकालकर हिनहिनाने लगा। पोनी वाले ने मुझसे उतरने के लिए कहा मैं उतर गयी। मैं पैदल चलने लगी। पोनी तेज भागकर रेत के ऊंचे टीले पर चढ़कर वहाँ उग रही छोटी-छोटी घास खाने लगा। मैं समझ गयी अब वह आजादी चाहता है :-)।
लगभग पचास मिनट पैदल चलकर मैं गुंजी-कैंप के प्रवेश द्वार पर पहुँच गयी। वहाँ खड़े अर्दली ने पोनीवाले को अंदर आने से मना कर वहीं से वापिस कर दिया और स्वयं मुझे अंदर अहाते में छोड गया।
अंदर बड़ी शांति थी। हमारे दल के जो यात्री पहुँच गए थे वह सब भी आराम कर रहे थे। मुझे एक कर्मचारी ने मेरा कमरा नंबर बताया। तभी एक कर्मचारी चाबी हाथ में लेकर आया और कमरे का ताला खोल कर मुझे प्रवेश करा गया और ताला-चाबी वहीं रखकर मुझसे कह गया ’कमरा खाली मत छोड़ना, ताला बंद करके ही बाहर जाना।’
गुंजी कैंप बहुत बड़ा है। इससे ही लगा हुआ भा.ति.सी.पु.ब. का कैंप है। दोनों ओर ठहरने के लिए डोम बने है तो बीच में सुंदर क्यारियाँ। बहुत साफ़-स्वच्छ!
हमारा कमरा फाइबर का डोम नहीं था, बल्कि टीन शेड वाला अच्छा-खासा कमरा था जिसके आगे पीछे बरांडे थे, एक पंक्ति में ऐसे ही कमरे थे जिसमें लकड़ी के छः तख्तों पर बिस्तर लगे हुए थे, सामने सब अर्धवृत्ताकर फ़ाइबर के शेड वाले डोम थे।

अपने कमरे में ठहरने वाले यात्रियों में मैं सबसे पहले पहुँची, थकी हुई थी। मैंने जूते उतारे, बैल्ट-पाऊच निकालकर सिरहाने रखा और लेट गयी। पायताने पड़ी रजाई को पैरों पर डाल कर आँखें बंद कर लीं। इतने में ही एक कर्मचारी मेरे लिए गर्म पानी और बुरांस का शरबत लाया पर मुझे किसी चीज की ज़रुरत महसूस नहीं हो रही थी सो मैंने विनम्रता से मना कर दिया।
अभी कुछ पल ही हुए थे कि बाहर से नोक करने की आवाज आयी मैंने आंखें खोलकर देखा तो सहयात्री श्रीमती ज्योत्सना शर्मा और रश्मी खंडूरी सामने खड़ीं थीं। वह दोनों मुझसे पहले पहुँच गयीं थीं और बरबर वाले कमरे में ठहरी हुई थीं। मैंने बैठते हुए उन्हें अंदर बुलाया और अपने पास बैठा लिया। हम तीनों बातें करने लगे। मेरी आँखें बार-बार बंद होती देख वह दोनों मुझे आराम करने की सलाह देकर चलीं गयीं। मैं कमरे में सोती रही। जब हमारे ग्रुप के अन्य यात्री आए और चहल-कदमी हुई तो मैं जाग गयी। मेरी थकान उतर गयी थी। सभी के हाल-चाल पूछे और बाहर आगयी।
बाहर बारिश हो रही थी यात्री भीगते हुए आ रहे थे। पर पहाड़ी मौसम धोखेबाज़ होता है। एकदम बारिश बंद हो गयी और मौसम साफ़! तेज धूप निकल आयी थी।
मैं इधर-उधर टहलने लगी, तभी मुझे मेरा पोर्टर दिखायी दिया। वह मेरे पास आकर बोला, “लगेज आगया है। मैं उठाकर ला रहा हूँ भीग गया है” और दोनों बैग्स उठाकर कमरे में रख गया।
मैं, नलिनाबेन और अन्य कई यात्री तो सुबह नहाकर चले थे पर बाकी यात्री बिना नहाए थे सो नहाने की व्यवस्था में लग गए। बड़े-बड़े पत्थरों को रखकर बनाए चूल्हे में आग जलाकर कु.मं.वि.नि. का कर्मचारी पानी गर्मकर रहा था। यात्री भी मदद कर रहे थे आग तेज करने में। 🙂
उधर रसोई में भोजन बन गया था, कर्मचारी भोजनालय वाले डोम में टेबल पर लगा चुके थे। नहा-धोकर तैयार हो-होकर यात्री खाना खाने पहुँचने लगे। मैं भी अपने सहयात्रियों के साथ खाना खाने पहुँच गयी। सब्जी, दाल, रायता, चावल और गर्म-गर्म रोटी अचार साथ में! सभी आनंद उठा रहे थे।
गुंजी पहुँचकर सभी यात्री रिलेक्स्ड महसूस रहे थे, क्योंकि कल भी पूरे दिन यहीं रुकना था। सो खाना खाकर सब सो गए। मैं भी पुनः लेट गयी पर मुझे नींद नहीं आयी क्योंकि मैं पहले सो चुकी थी।
मैं चुपके से उठी और आहिस्ता से दरवाजा खोला और अपने लगेज के दोनों नग बाहर वरांडे में खींचकर लेगयी। बैग खोलकर पिछले दिनों में पहने हुए गंदे कपड़े और वॉशिंग-पाऊडर निकालकर बाथरुम में जाकर कपड़े धोए और धूप में सुखा आयी। तभी देखा कि सामने बहुत छोटे से केविन में फॉन करने के लिए लोग खड़े थे, मैं कमरे में आयी और कुछ रुपए बेल्ट-पाऊच से निकाल कर ले गयी।
लोग कई-कई फॉन कर रहे थे और लंबी-लंबी बातचीत कर रहे थे। किसी-किसी यात्री का फॉन मिल भी नहीं रहा था। सभी को जल्दी थी क्योंकि सैटेलाइट फोन से कई बार कट जाता था।
मैंने नंबर से पहले ही अपने से आगे प्रकाशवीर और के.के. सिंह से पूछकर आपना फॉन मिलाया और अति संक्षेप में घर पर राजी-खुशी बताकर मुश्किल से एक मिनट में ही फॉन काट दिया। वे दोनों मेरी शीघ्रता पर हंसने लगे।(मैं तीर्थयात्रा पर चलते समय ही अपने परिवार के सदस्यों से निवेदन करके आयी थी “यात्रा के दिनों में मैं प्रतिदिन अपनी कुशल-क्षेम बताने की कोशिश करूंगी पर अति संक्षेप में और किसी एक सदस्य को ही। वही सद्स्य सभी को सूचित कर देगा।” मुझे पता था कि इतनी ऊँचाई पर बहुत मुश्किल होगी और सभी को समय मिलना चाहिए।)
फॉन करके मैं अपने बिस्तर पर जाकर बैठ गयी। सभी जाग गए थे। जब फोन की बात पता चली तो सभी फोन करने चले गए। लौट कर सब फिर बिस्तर में बैठ गए। चाय आ गयी थी हम अपने-अपने घरों से जो खाने का सामान ले गए थे अपने अपने बैग्स से निकाले और मिलकर चाय के साथ खाने लगे।
तभी बातचीत में पता चला कि गुंजी में जवानों ने एक छोटा सा मंदिर भी बना रखा है। शाम को वहाँ कीर्तन और आरती में शामिल होना था। एलओ ने सूप पीने के बाद मंदिर पहुँचने का कार्यक्रम रखा था।

छः बजे के आसपास सूप सर्व किया गया। मैं और नलिनाबेन बाकी ग्रुप-सदस्यों को बताकर मंदिर चले गए।
मंदिर कैंप से लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर के फ़ासले पर था। एक छोटा कमरा जिसके अंदर बिल्कुल सामने एक कोठरी मे मूर्तियाँ लगायी हुईं थी।
बाहर आरती इत्यादि के पोस्टर लगाए हुए थे। देखभाल भी जवान ही करते हैं।
मंदिर में कुछ जवान और कुछ सहयात्री पहले से ही बैठे थे। हम भी बैठ गए। एक जवान अंदर मूर्तियों के पास पूजा और आरती की तैयारी कर रहा था। बाह्र वाले कख्श में बैठे जवानों ने ढोलक, मंजीरे, चिमटे और हारमोनियम पर तान छेड़कर बहुत सुंदर भजन सुनाए तो तीर्थयात्रियों ने तालियाँ बजाकर उनका साथ दिया। सुनसान पर्वतों के बीच भक्ति का ऐसा समां बंधा कि कब नौ बज गए पता ही न चला। पूरा मंदिर भरा हुआ था। समापन भगवान शिव और दुर्गा माता की आरती से हुआ। सभी आरती और प्रसाद लेकर वापिस कैंप आगए।
आते ही सीधे सभी भोजन-कक्ष की ओर चले गए। भोजन सजा हुआ था। एलओ जो हमेशा रात के खाने के समय ही सुबह के कार्यक्रम की आउटलाइन बताते थे, ने सभी से अपनी-अपनी मेडिकल-जाँच रिपोर्ट की फ़ाइल(जो दिल्ली में अस्पताल से मिली थी) बाहर रखने और साढ़े आठ बजे तक नाश्ता करके अपने अपने ग्रुपके साथ आई.टी.बी.पी. के प्रांगण में चलने के लिए तैयार रहने को कहा। तत्पश्चात अशोकजी ने वंदना करायी और सब खाना खाने लगे। कढ़ी, सब्जी दाल, रोटी चावल के साथ मीठी सैंवैंया भी थीं। भोजन सुस्वादु था। सभी ने कु.म.वि.नि. के कर्मचारियों की प्रशंसा की और धन्यवाद दिया। सच में बहुत ही स्नेह और आदर के साथ वे लोग खाना खिलाते और सेवा करते थे। हम हमेशा उनके आभारी रहेंगे।
खाना खाकर जब बाहर आए तो ठंडी हवा चलने के कारण बहुत ठंड लग रही थी। जल्दी से सभी अपने-अपने कक्ष में जाकर बिस्तर में बैठ गए। मैं, नलिनाबेन, स्नेहलता और श्रीमति बहुत देर तक बातें करते रहे। जब बहुत देर हो गयी तो सुबह उठने की दुहाई देते हुए सो गए।
क्रमशः

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