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बुद्धि से गुंजी

अप्रैल 30, 2011

11/6/2010 आठवाँ दिन
बुद्धि से गुंजी 17 किमी है।

रास्ता = वाया छियालेख> गर्ब्यांग(गांव)>सीती
बुद्धि से गर्ब्यांग
वाया छियालेख ( छियालेख मानो स्विटजरलैंड हो)


रात जल्दी सो जाने के कारण सुबह चार बजे आँख खुल गयी। मैंने सिरहाने के ऊपर ही लगे तख्ते पर मोमबत्ती जलायी और बैग से टूथ-ब्रश और पेस्ट इत्यादि लेकर पिछले दरवाजे से बाहर की ओर निकल गयी क्योंकि उधर ही लेट्रीन-बाथरुम बने हुए थे।
बाहर गुपा-गुप अंधेरा था, पर और यात्रियों की चहल-क़दमी भी सुनाई दे रही थी सो डर नहीं लगा। मैं बाथरुम में घुस गयी।
फ़्रेश होकर पुनः अंदर कमरे में आयी तब तक चाय-वाला कमरे में ही चाय ले आया था। हमारे कमरे के सभी यात्री चाय पी रहे थे। एक दूसरे को अभिवादन किया और चाय का गिलास लेकर रसोई की ओर चली गयी।
रसोई धुएं से काली एक बहुत छोटी सी कोठरी थी जिसके दरवाजे के बाहर रात चूल्हे के पास सूखने रखे तीर्थयात्रियों के जूते पड़े थे और अंदर एक ओर एक छवड़े में बहुत सारे बर्तन रखे थे सामने ही भट्टीनुमा बहुत बड़े चूल्हे में बड़े-बड़े लक्कड़ जलाए जा रहे थे और लगभग बीस लीटर आयतन वाले एल्म्यूनियम के भिगोने में कु.मं.वि.नि. का एक कर्मचारी पानी गर्म कर रहा था।
मुझे देखते ही उसने नमस्कार किया और बोला-’आइए मैडम आपको गर्म पानी चाहिए या चाय?’ मैंने चूल्हे के पास पड़े पटरे पर बैठते हुए कहा- ’मुझे नहाने के लिए गर्म पानी चाहिए और मैं कुछ देर अपने जूते यहाँ आग के सामने रख जा रही हूँ’ उसने मेरे जूते एक लक्कड़ पर रखकर आगके पास सूखने रख दिए और दरवाजे के बाहर रखी लोहे की बाल्टी गर्म पानी से भरकर मेरे कमरे के पास वाले बाथरुम में रख आया। मैं नहाने चली गयी। बाद में नलिनाबैन भी नहाने के लिए पानी लेने चलीं गयीं। कुछ ही यात्रियों ने स्नान किया।
मैं बहुत जल्दी तैयार होगयी। अपना लगेज व्यवस्थित करके बाहर बालाजी को सौंप दिया, हैंड बैग पोर्टर को सौंप दिया। पोर्टर बहुत पुराना कर्मचारी था सो गेस्टहाऊस के सभी कर्मचारियों को जानता था, उन्हीं के पास रात को ठहर जाता था और सुबह जल्दी उठकर हमारी मदद कर देता था।
मैं बेंत भी पोर्टर को पकड़ाकर रसोई में जूते पहनने चली गयी। जूते काफ़ी सूख गए थे , पहनकर हाथ धोकर थोड़ा सा बोर्नविटा पिया और अन्य यात्रियों से बातें करने लगी।
अबतक एलओ सीटी बजाकर सभी को बुला चुके थे। दो-चार को छोड़कर सभी तीर्थयात्री तैयार होकर पहुँच गए थे, जो नहीं पहुँचे थे एलओ उनसे जल्दी करने के लिए कह रहे थे। जो यात्री उनके पास खड़े थे वे हंसते हुए ज़ोर-ज़ोर से हरी-अप, हरी-अप चिल्ला रहे थे। ’अरे प्रकाशवीर जल्दी करो, अरे अमर जल्दी आओ फ़ाइन हो जाएगा’! लेट यात्री हबड़-तवड़ भागे चले आरहे थे, कोई बेल्ट बाँधता आरहा था तो कोई टोपी ठीक करता तो कोई ग्ल्व्ज़ पहनता 🙂 बाकी खड़े सब हंस रहे थे और पचास-पचास रुपए परहैड के हिसाब से फ़ाइन की राशिजोड़ रहे थे। :-)तीन सदस्यों पर फ़ाइन हुआ। तुरंत डेढ़ सौ रुपए एकत्र कर लिए गए।
{फ़ाइन की बात पर याद आया कि मैं एक बात बताना भूल गयी थी शुरु में। कुछ यात्री लेट उठने के आदि थे सो रोजाना लेट न हो जाएं इसके कारण एलओ साहब ने पहले दिन ही अल्मोड़ा में रात्रि-भोजन के समय हम सब की सहमति से एक नियम बना दिया था कि जो यात्री मीटिंग में या डिपारचर के समय लेट पहुँचेगा तो उसे पचास रुपया उसी समय हमारे मनोनीत कैशियर सहयात्री श्री वेणुगोपालजी के पास जमा कराना पड़ेगा। यह हरेक यात्री पर लागू था। हम सभी इसका पालन बड़े मन से करते और कराते थे। 🙂 कोई ज़रा सी भी देर करे तो उसे अवज्ञा मान लेते थे। जिसपर फ़ाइन होता था उसका खूब मज़ाक भी बनाते थे।}
एलओ ने सभी ग्रुप लीडर्स से अपने-अपने सदस्य गिनने को कहा, जब सब ने अपने-अपने ग्रुप को पूरा उपस्थित बता दिया तो सहयात्री अशोक कुमार जी ने प्रतिदिन की तरह शिव-वंदना करायी और शिव नाम के जयकारे लगवाए। एलओ ने प्रस्थान का इशारा किया और सब चल पड़े।
आकाश में बादल छाए हुए थे। हल्की-हल्की फुहारें भी पड़ रहीं थीं। सभी रैन सूट में थे। सिर से पैर तक रैन-प्रूफ़ कवर। काफ़िला चल पड़ा। पोर्टर से बेंत लेकर मैं सभी के साथ चल पड़ी। थोड़ा सा ही आगे जाने पर पोनीवाल मिल गया।
आज पोनी वाले के साथ एक और लड़का था। यह वही लड़का था जो कल बंसल जी को लेकर आया था। लड़के ने मुझे ऊंचे पत्थर के पास पोनी पर बैठने के लिए कहा है। मैंने पुराने वाले की ओर देखा पर वह कुछ न बोला, उसी ने बताया, ’वह नया है पहली बार आया है इसलिए ठीक से ले जा नहीं पा रहा है’। मेरे घोड़े के (सहयात्री बंसल जी वाले घोड़े के) पैर में कांटा लग गया है, यह उसे लेकर नीचे जाएगा मैं आपको आगे तक लेकर जाऊंगा।’ मैंने फिर पहलेवाले लड़के से पूछा तो इसबार उसने भी हाँ मिला दी। मैंने सोचा मुझे क्या! मैं तो कु.मं.वि.नि. के ठेकेदार से पोनी हायर किए हुए हूँ कोई भी चलाए और पोनी पर बैठकर आगे बढ़ गयी।
गीले पहाड़ी संकरे मार्ग पर पोनी बहुत धीरे-धीरे चढ रहा था। फिसलने का बहुत डर था। मैं आगे की ओर झुककर शरीर का संतुलन बना रही थी ताकि गिर न जाऊँ।
थोड़ी देर में बारिश लुप्त और आकाश बिल्कुल नीला दिखाई दे रहा था। जो हवा ग्लब्ज़ में भी हाथ गला रही थी अब कुछ अनुशासित लगी। दिवाकर अपनी रश्मियाँ लुटा रहे थे। वर्षा-वनों की हरियाली से लदे पहाड़ों पर पड़ीं सूर्य की प्रातःकालीन कोमल किरणें प्रकृति को दिव्य-सौंदर्य प्रदान कर रहीं थीं। दायीं ओर बिल्कुल सामने हिम-मंडित धवल पर्वत-श्रंखला थी।
’धवल चोटियों के नीचे छियालेख के गहरे हरे मैदान’ क्या अप्रतिम सौंदर्य!!! हम निहारते आगे बढ़ रहे थे कि तभी हमारे पोर्टर ने हमें और अन्य तीर्थ-यात्रियों को उनके बीच में अन्नपूर्णा चोटी के दर्शन कराए। हमारा पोर्टर एक गाइड की तरह भी हमें बताता चलता था। हलांकि कु.मं.वि.नि. ने दिल्ली से ही हमारे ग्रुप के लिए एक प्रशिक्षित गाइड की व्यवस्था कर रखी थी, पर एक गाइड कितने तीर्थ-यात्रियों के सथ चल सकता था!
हम सौंदर्य की पराकाष्ठा से मिलते हुए पहाड़ घाटी और नदी-झरने पार करते आगे बढ़ रहे थे कि तभी पोनी वाले ने पोनी रोक दिया, क्योंकि यहाँ हमें नाश्ता करना था।
एक छोटी से टीन से पटे कमरे में टेबल के चारों कुछ बेंच और कुर्सियाँ लगीं थीं जिन पर बैठकर यात्री गर्म छोले-पूरी का आनंद ले रहे थे। शायद यह स्थानीय ढाबा टाइप था जहाँ कु.मं.वि.नि. ने तीर्थ-यात्रियों के लिए नाश्ते का इंतजाम किया था।
कुछ यात्री प्रकाशवीर ग्रुप इत्यादि पहले पहुँचकर अपनी थाली लेकर बाहर धूप में मुंडेरसी पर बैठकर खा रहे थे। मैं, वीना मैसूर और स्नेहलता जी एक साथ बैठकर अंदर ही खा रहे थे तभी जुनेजा और एलओ भी आगए और हमारी टेबल पर खाली जगह देखकर उस पर ही नाश्ता करने लगे। वे दोनों हम चारों स्त्रियों की दोस्ती देखकर मज़ाक बनाने लगे और कहने लगे- ’आखिर तक हम आपकी लड़ाई करा देंगे’ 🙂 हमने हंसते हुए उनके चैलेंज को स्वीकार कर लिया और नाश्ता खाने में ध्यान लगाने को कहा। हम नाश्ता करके और चाय पीकर बाहर आए तो पता चला कि एक किमी की दूरी पर ही हमारे पासपोर्ट चैक हो रहे थे।
भारत-तिब्बत-सीमा-पुलिस बल की चैकपोस्ट थी वह। काफ़ी सारे सिपाही थे। चारों ओर राइफ़्ल्स लिए जवान खड़े थे। कोई बिना चैकिंग के आगे नहीं बढ़ सकता था। एक चबूतरे पर एक सिपाही एक रजिस्टर लिए बैठा था, जिसमें हम सभी तीर्थ-यात्रियों की डिटेल थी और फोटो भी लगी थी। वह उससे हमें और हमारे पासपोर्ट को मिलाकर हस्ताक्षर करवा कर आगे भेज रहा था।
मैंने अपने बेल्ट-पाऊच से पासपोर्ट निकाला और वहाँ जाकर लाइन में लग गयी। स्नेहलताजी ने पासपोर्ट अपने लगेज के साथ रख दिया था जबकि एलओ ने दिल्ली में ही सभी को पासपोर्ट हमेशा अपने साथ रखने को कहा था। उस समय वह बहुत परेशान हो रहीं थीं। बहुत देर बाद एलओ ने अपनी गारंटी पर आगे निकाला। एक दो यात्री और थे जिनको ऐसी ही कुछ दिक्कत आयी थी।
मैं पोनी पर बैठकर आगे बढ गयी। छियालेख की घाटी के सौंदर्य के मोहपाश में बंधे चलते-चलते जब ’गर्ब्यांग’ गांव की कच्ची गलियों के घरों के नक्काशीदार दरवाज़े दिखायी देने लगे और क़तारों में पहाड़ी घर नज़र आने लगे तो ध्यान बदला।
गर्ब्यांग में रिहाइश अधिक नहीं थी। बहुत कम लोग वहाँ रहते हैं। बच्चे पढ़-लिखकर शहरों में बस गए हैं। कई तो प्रशासनिक-अधिकारी आई.ए.एस. भी हैं। वे सब कभी-कभी गर्मियों में अपना घर और खेत देखने आजाते हैं। उससमय कैलाश-मानसरोवर और छोटा/आदि कैलाश जाने वाले तीर्थयात्रियों के आवागमन की चहल-पहल देखने भी गांव आए हुए थे। गांव की स्त्रियाँ परंपरागत वेश-भूषा में थीं। जब हमने उनका फोटो लेना चाहा तो वह घूंघ्हट खींचकर अंदर छिप गयीं।
मैंने पोनीवाले को रोकरोक कर पोनी पर बैठे-बैठे ही अनेक फोटो खींचे और इतनी ऊंचाई पर गांव को देखती हुयी पोर्टर से जानकारी हासिल करती हुई बढने लगी इतने में ही भा.ति.सी.पु.ब. का जवान भी फोटो खींचता दिखायी दिया। उसने बताया कि वे हर ग्रुप की यात्रा की वीडियो रील और एलबम बना रहे थे। उसने मेरे पोनी पर बैठे हुए कई फोटो लिए। मैंने उससे मेरे कैमरे से फोटो खींचने का अनुरोध किया तो उसने वैसा भी कर दिया। मैं उसका धन्यवाद करके आगे चल पड़ी।
गांव की गलियों से आगे बढ़े तो मैदान सा आया जहाँ सिपाहियों ने फिर रोका। पोनीवाले लड़के को अपना आई-कार्ड चैक कराने एक तरफ़ भेज दिया और मुझे बड़े आदर से दो सिपाही उस ओर ले गए जहाँ खुले में ही खिलती धूप में मेज-कुर्सी लगी हुई थीं। मैं जाकर बैठ गयी। इतने में ही नलिनाबैन और एलओ भी पहुँच गए। उनको भी बिठाया और पहले गर्म पानी फिर चाय और चिप्स दिए हमने हल्की-फुल्की बातचीत करते हुए चाय ली। मैं तेज धूप में गर्मी महसूस कर रही थी सो सबसे ऊपर पहना स्वेटर उतारकर कंधे पर डाल कर पोनी पर चढ़कर पुनः चल दी…

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