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कैलाश-परिक्रमा प्रारंभ

मई 14, 2011

18-जून-2010( पँद्रहवां दिन)
आज की यात्रा के कई चरण थे।
पहला चरण
दारचेन से यम-द्वार (लगभग दस किमी)

सुबह चार बजे आँख खुल गयी। उठकर बाहर देखा तो इक्का-दुक्का यात्री दिखायी दिए। मैं भी टार्च लेकर दैनिक-चर्या से निपटने बाहर आगयी। बाहर बहुत तेज हवा चल रही थी मैं ठंड से कांपती हुयी अहाता पार करके टॉयलेट तक पहुँची। टायलेट का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं होता था मैं सोचती-सोचती कोई विकल्प न होने के कारण अंदर चली गयी।
दैनिक-चर्या से निपटकर बर्फ़ से ठंडे पानी से हाथ-मुंह धोकर कमरे में पहुँची तो अन्य लोग भी उठ चुके थे। चाय पी रहे थे। मैं भी रसोई से चाय ले आयी।
आज नहाने की गुंजाइश बिलकुल नहीं थी। न तो पानी गर्म हो सकता था और न बाथरुम जैसा कोई प्रबंध था। मन मसोसकर गीले-तौलिए से शरीर पोंछकर धुले वस्त्र पहनकर तैयार हो गयी।
आज नाश्ते में उपमा बना था। इतनी सुबह बहुत इच्छा नहीं थी पर थोड़ा सा खा लिया और पुनः चाय पी ली।
लगेज कमेटी ने छोड़कर जाने वाला लगेज इकट्ठा एक कमरे में रखवा दिया। मैं अन्य यात्रियों के साथ बेल्ट-पाऊच कमर में बाँधकर साथ-लेजाने वाला बैग जिसमें आवश्यक कपड़ों के अतिरिक्त, खाने का सामान(ड्राई-फ्रूट्स इत्यादिजो घर से लाई थी) एनर्जी-ड्रिंक, पानी की बोतल और बेंत लेकर वराण्डे से बाहर आगयी।
अहाते में ही बस खड़ी थी। यह वही बस थी जो पहले दिन से हमें अभीष्ट-स्थान पर पहुँचा रही थी। हम बस में जाकर बैठ गए।
छः बजे एलओ ने सीटी बजाई, सभी ग्रुप-लीडर्स से यात्रियों की उपस्थिति पूछी। सभी बस में बैठ चुके थे। प्रकाशवीर ने भोलेबाबा के जयकारे लगवाए। उत्साहित यात्रियों ने पूरी शक्ति से जय-जयकार किया। सवा छः बजे बस चल पड़ी। दारचैन छोड़कर बिलकुल सुनसान में दौड़ने लगी।
चारों ओर मिट्टी के टीले जिनमें प्रकृति ने अपनी अद्भुत कलाकारी कर रखी थी ऐसा लगता था मानों किसी पुराने कई मंझिला महल के खंडहर हों, उन्हें देखकर अचंभित होने के अतिरिक्त और कुछ भाव नहीं आ सकता था अजब तेरी कला भगवान!
दूर नग्न पहाड़ों के बीच हिम-मंडित धवल कैलाश-पर्वत अपने अप्रतिम सौंदर्य के साथ दर्शन दे रहे थे। रात भर हिम-आच्छादन ने उन्हें और आकर्षक बना दिया था। हम खिड़की से एकटक देखते और फोटो लेते जा रहे थे। साढ़े आठ बजे के आसपास बस एक स्थान पर आकर रुक गयी। सभी यात्री नीचे उतर आए। सामने एक छोटा सा मंदिर के आकार में द्वार बना था।
गुरु ने बताया- “यह यम-द्वार है। इस द्वार की परिक्रमा करके कैलाश की परिक्रमा प्रारंभ होती है तो मृत्यु-भय समाप्त हो जाता है। द्वार के इस ओर संसार है तो उस पार मोक्ष-धाम! लामालोग यहाँ आकर प्राणांत होने को मोक्ष-प्राप्ति मानते हैं। इसलिए बीमार लामा अंतिम इच्छा के रुप में यहाँ जाते हैं और प्राण-त्यागते हैं।”
यम-द्वार सफ़ेद पुता हुआ था। उसके दोनों ओर छोटे-छोटे चबूतरे बने थे। लोग शरीर-त्याग के प्रतीक के रुप में अपने शरीर से बाल नोंचकर वहाँ अर्पित कर रहे थे। कुछ शिलाओं पर लिखा हुआ था जो बौद्ध-अनुयायियों के उपदेश बताए गए। द्वार के पार कैलाश-धाम अपने चरम सौंदर्य के साथ दैदिप्यमान हो रहे थे।
सभी परिक्रमा करके चारों ओर पठार के टीलों में प्राकृतिक नक्काशी को अचरज से देख रहे थे। ऐसा लगता था जैसे अद्भुत अलौकिक शांति में योगिनियाँ विराजमान हों।
अभी निहार ही रहे थे उन दृश्यों को कि प्रायवेट टूर वालों की जीप्सियाँ आगयीं और अनेक तीर्थ-यात्रियों के आने से भीड़ जैसी हो गयी।
गुरु ने हम सभी से बस में बैठने को कहा क्योंकि आगे पोनी-पोर्टर मिलने में परेशानी होती। सभी पुनः बस में जाकर बैठ गए।

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