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लखनपुर से मालपा

अप्रैल 26, 2011

(10/6/2010 सातवाँ दिन) गतांक से आगे…

लखनपुर से मालपा

सीढ़ियाँ उतरते-उतरते घुटने जवाब देने लगे थे पर कैलाश दर्शन की लालसा से हिम्मत पूरा साथ दे रही थी। पोर्टर भगवान का दूत लग रहा था। 🙂 जो बड़े संतुलित और संयमित ढंग से ले जा रहा था। रास्ता ऐसा था कि कहीं रुक नहीं सकते थे। पहाड़ और खाई के बीच सीढ़ीनुमा रास्ता!!
अंत मे वे सीढ़ियाँ आ ही गयीं जब पोर्टर ने कहा ’बस खत्म हो गयीं सीढ़ियाँ’ मैंने पोनी के बारे में जानना चाहा कि वह कब बिठाएगा तो पोर्टर ने दूर एक जगह दिखाते हुए कहा कि वहाँ मिलेगा। पर वहाँ पहुंचने पर भी वह वहाँ न मिला।
मैं पसीने में तर-बतर हाँफती हुई बार-बार पोर्टर से पानी की बोतल मांगकर दो घूंट पानी पीती और वापिस देती हुई आगे बढ़ रही थी पर चलना कठिन हो रहा था क्योंकि मार्तंड बिल्कुल सहयोग नहीं कर रहे थे, बल्कि हमारी परीक्षा सी ले रहे थे। हवा धूल उड़ा रही थी।

घुमावदार छोटी सी पगडंडी जिसके एक ओर विशाल-विकराल अटल पहाड़ थोड़ी सी भी जगह अपनी ओर नहीं दे रहे थे तो दूसरी ओर सांय-सांय करती, गिरी हुयी शिलाओं और चट्टानों पर से कूदती-फांदती काली काल-रुप में अपनी ओर खिसकने नहीं देती थी। बस संकुचित रास्ते पर आंखें गढ़ाए चलते जा रहे थे, बेंत का सहारा और पोर्टर का साथ हमें निर्देशित सा कर रहा था।
कहीं कोई पहाड़ की खखोड़ आती तो पोर्टर बैठने की सलाह देता और हम कुछ क्षण बैठकर पानी पीते और नीचे काली को उदंडता करते देखते, फिर उठकर चल पड़ते ऐसे करते हुए बहुत देर हो गयी तो मैं एक जगह बैठ गयी और पोनी का इंतजार करने लगीं। पीछे से और तीर्थयात्री भी आने लगे पर किसी ने मेरे पोनीवाले को नहीं देखा था।
मैंने बिना पोनी के आगे बढ़ने के लिए सख्ती से मना कर दिया तो मुझे एक संतुलित सी जगह पर बैठाकर मेरा पोर्टर पुल पार पोनीवाले को ढूढने गया। मैं काफ़ी देर बैठी रही।
सूर्य बिल्कुल सीधे मेरे सिर पर धमक रहे थे सो मैंने स्कार्फ़ से पूरा चेहरा ढककर बस आंखें छोड़ रही थीं। गौगल्स काम नहीं कर रहे थे, सांस की भाप उन्हें धुंधला कर देती थी, बार-बार साफ़ करने पड़ रहे थे।
सुनसान में मुझे अजीब सा तो लग रहा था, सामने काली बहुत डरा रही थी जैसे मुझी बुला रही हो मैं डर को दूर करती हुयी फोटो ले रही थी। तभी भेड़ों के झुंड को हांकती हुयी दो स्थानीय स्त्रियाँ वहाँ से निकली, मैं भेड़ों की एकजुटता और आपसी विश्वास के विषय में सोचने लगी – मनुष्य तो परस्पर इतना विश्वास नहीं करता …
दूसरी ओर से भी भेड़ो का झुंड आ रहा था जिसे एक पुरुष हाँक रहा था। भेड़ें चिल्लाती हुयी और चट्टानों पर चढ़ती-उतरती अपने झुंड के साथ भागने लगीं।
उसने कुमाऊंनी मिश्रित भाषा में मेरे पोर्टर का संदेश दिया कि पोनी नहीं मिला है। वह पुलपार मेरा इंतजार कर रहा है। मैं वहीं पहुंच जाऊं। मैं पहले तो बैठी रही यह सोचकर कि वह वापिस आएगा पर पीछे से मुझे सहयात्री स्मिताबेन पैदल आती दिखायी दीं। मैं उनके साथ आगे बढ़ने लगी, उनका पोनी और पोर्टर तो उनके साथ-साथ चल रहे थे, चाहे वह बैठे या न बैठें। मैं ने सोचा ’मेरा पोनी तो नाश्ते के समय से गायब है? चीटिंग कर रहा होगा? अन्य क्या कारण होगा?’और चलती रही।
अब आया एक लकड़ी का हिलता सा पुल जिसके नीचे एक ओर सुपरफ़ास्ट ट्रेन की गति के समान तड़तड़-धड़धड़ गिरता झरना जिसके छींटें पुल के ऊपर भी आ रहे थे दूसरी ओर से आती काली नदी में मिल रहा था। हम दोनों चलने लगे फिर मैंने सोचा कुछ दृश्य कैमरे के अधीन कर दिए जाएं। कुछ चित्र और वीडियो लिए और फ़िर चल पड़ी। थोड़ा आगे बढ़ते ही पोर्टर भी वापिस आता मिल गया और साथ हो लिया।
हमने पोर्टर से पूछा, “मालपा कितनी दूर है?” उसने कहा- ’बस आने ही वाला है।’ इस जगह पर भूस्खलन के कारण चारों ओर चट्टानें बिखरी पड़ी थीं।
असल में यह वही जगह थी जहाँ १९९८ में भूस्खलन के साथ-साथ बादल फटने और पुल टूटने की दुर्घटना हुयी थी जिसमें मालप कैंप में रुका कै.मा. तीर्थयात्रियों का पूरा जत्था ही काल के मुंह में समा गया था। अनेक पोनी-पोर्टर और कर्मचारी भी थे जिनके शव भी न मिल सके। प्रकृति प्रलंय रुप में हो गयी थी।
स्वर्गवासी तीर्थ-यात्रियों और कर्मचारियों को मन ही मन प्रणाम करते हुए हम दोनों ने रुककर एक पल को आंखें बंद की और फिर चल पड़े। स्मरण रहे अब मालपा में कैंप नहीं लगता क्योंकि यह अभी भी सुरक्षित नहीं है पहाड़ गिरते रहते हैं इसलिए ’बुद्धि’ शिफ़्ट कर दिया गया है।
थोड़ा आगे चलने पर बिल्कुल पास में ही हमारा दोपहर के भोजन का प्रबंध था। छोटे से चारदीवारी से घिरे आंगन में चारों ओर बैठने के लिए सीमेंट की मुंडेर सी बनी थीं जिन पर दरी बिछी हुयी थी। बीच में छोटी सी मेज पर परात में सब्जियाँ थीं।
जब हम पहुंचे तो सहयात्री श्रीमती ज्योत्सा शर्मा और उनके पति आगे जाने के लिए तैयार थे। हमने उनसे हालचाल पूछा और उनको जाने दिया फिर जूते उतारकर हाथ-मुंह धोकर खाना लेने लगे।
राई के पत्तों की तरी वाली सब्जी दाल और रोटी। इस जंगल में धन्य हैं वे कर्मचारी जो इतना भी मुहैया करा रहे थे! पर कुछ यात्रियों ने मुंह सिकोड़ा और चखकर दूर बैठ गए। मैं खाने का निरादर नहीं करती हूं साथ ही कहीं पढ़ा था कि पहाड़ों पर मिलने वाली हरी पत्तों वाली तरकारी पर्वतारोहियों के लिए बहुत लाभदायक होती हैं सो मैं ने तो थोड़ा खाना खा लिया।
पोर्टर्स के लिए खाने की जगह अलग थी सो वह वहाँ चला गया।
मैं जल्दी ही निवृत्त हो गयी, मैंने पोर्टर को आवाज लगायी साथ चलने के लिए। उसने इशारे से कुछ देर रुकने के लिए कहा और यह भी बताया कि पोनीवाला भी है। मैं पोनी मिलने की बात से खुश हो गयी और चाय पीते हुए उन दोनों का इंतज़ार करने लगी…

(अगले अंक में बुद्धि पहुंचेंगे)

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